गांव की मिट्टी से उठकर बने मसीहा, पंडरी के इस शख्स की प्रेरक कहानी

अमेठी: हमारे आसपास कहीं ऐसे प्रसिद्ध व्यक्तित्व वाले लोग समाज में होते हैं, जिनकी कहानी हमें प्रेरणा देती है. उनके ना रहने पर भी हम उन्हें सम्मानजनक तरीके से याद करते हैं और उन्हें सम्मान देते हैं. हर क्षेत्र में अहम योगदान रखने वाले 1911 में जन्मे भगवत प्रसाद पांडे की कहानी भी दिलचस्प और प्रेरणादायक है. आज उनके ना रहने पर भी उन्हें याद किया जाता है. उन्होंने हर क्षेत्र में अपना योगदान दिया. शिक्षा सुधार से लेकर समाज सेवा तक, राजनीति से लेकर देश की आजादी और संविधान तक, उन्होंने अपना पूरा योगदान दिया. उनकी कहानी काफी प्रेरणादायक है.

अमेठी जिले के गौरीगंज तहसील क्षेत्र के पंडरी गांव मे जन्में भगवत प्रसाद पांडे काफी नेक दिल इंसान थे. कहानी कुछ इस तरह है कि गांव की मिट्टी में जन्मे भगवत प्रसाद पांडे ने कभी अपने आपको बहुत बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं की. शानो-शौकत और विलासिता के जीवन को त्यागकर उन्होनें प्रजा की सेवा में अपना सर्वस्त्र जीवन बलिदान करना ही उचित समझा. इनका जन्म 1911 ई. में हुआ था. बचपन से ही उन्होंने गरीबों के कल्याण के साथ-साथ हर क्षेत्र में अपना योगदान दिया. इसके साथ ही गांव के प्रथम सरपंच के रूप में भी उन्होंने गांव के हर उस विकास कार्य को पूरा कराया, जो समय की वास्तविक जरुरत थी. 1991 में भले ही उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन आज भी उनको लोग याद करते हैं.

संविधान के बाद बने प्रथम सरपंच
भारत की आजादी के बाद पण्डरी की प्रत्यक्ष राजनीति में सबसे पहला और सफल कदम उन्हीं का था. उन्होंने संविधान की स्थापना के बाद 1972 से लगातार 22 वर्षों तक गांव के सरपंच के रूप में गांव के लोगों की सेवा की. उस समय गांव में विकास कार्य की बहुत ज्यादा कमी थी. ना तो गांव में सड़क थी, ना पानी की सुविधा, उन्होंने बिजली, पानी, सड़क के साथ हर विकास कार्य को पूरा किया, जो गांव की वास्तविक जरुरत थी. करीब 22 सालों तक उन्होंने गांव के लोगों को शहर जैसी सुविधा दी. पण्डरी की जनता में उनका इतना अधिक दबदबा था कि चुनाव में उनके खिलाफ खड़ा होने की किसी अन्य व्यक्ति की हिम्मत तक न थी.

इंटर कॉलेज तक की कराई स्थापना
भगवत प्रसाद पांडे की कहानी दिलचस्प इसलिए है, क्योंकि उन्होंने समाज सेवा विकास कार्य के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया. जब लोग शिक्षा के लिए तरसते थे. इस दौरान उन्होंने गांव में ना सिर्फ प्राथमिक पाठशाला की स्थापना कराई, बल्कि अपने निजी खर्चे से उसको संचालित भी कराया. बाद में उसे सरकारी विद्यालय की मान्यता दे दी गई. प्राइमरी पाठशाला के साथ-साथ गांव में ही उन्होंने जूनियर हाई स्कूल की स्थापना कराई, जिसे आज इंटर कॉलेज के रूप में विकसित किया गया है. यहां के पढ़े व्यक्ति आज बड़े-बड़े शहरों में बड़े पदों पर हैं.

पिताजी का हर क्षेत्र में था योगदान
आज भगवत प्रसाद पांडे तो नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी बताते वक्त उनके बेटे और आज उनकी विरासत को संभाल रहे राजेश पांडे ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उन्होंने अपने बचपन में पिता के हर उस अच्छे कार्य को देखा समझा, जो ना सिर्फ जरूरी था, बल्कि महत्वपूर्ण भी था. उन्होंने कहा कि शिक्षा का क्षेत्र हो, समाज सेवा हो, राजनीति हो, हर क्षेत्र में पिताजी का सार्थक कदम था. उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सबसे पहले लोगों की मांग पर प्राथमिक पाठशाला संचालन कराया. फिर गांव में ही उन्होंने दूसरी स्थापना जूनियर हाई स्कूल की. तब छप्पर का कमरा हुआ करता था.

उन्होंने बताया कि ईर्ष्या और दोष रखने वाले लोगों ने उसे जला दिया, फिर बाद में उस पर मिट्टी से कमरे का निर्माण कराया गया. बाढ़ आई और वह भी पूरी तरीके से बर्बाद हो गया, लेकिन पिताजी ने हार नहीं मानी और फिर अपने निजी संपत्ति से विद्यालय की नींव रखी. सुल्तानपुर से कारीगर बुलाए गए और आज उनकी देन है कि समाज में हर क्षेत्र में उनके योगदान को लोग याद करते हैं. उन्होंने कहा कि पिताजी ने सड़क बनवाई, समाज सेवा में लोगों की मदद की और हर क्षेत्र में भी अहम योगदान देकर आज भी अमर हैं. आज उनके ना रहने पर भी हम सब उन्हें याद करते हैं और क्षेत्र के लोग आज भी उन्हें मसीहा के रूप में सम्मान देते हैं.

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dainikupeditor@gmail.com

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