Opinion : BHU में सिक्योरिटी गार्ड को थप्पड़ मारने का अधिकार किसने दिया?

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के विश्वनाथ मंदिर परिसर में प्रेमी युगल के साथ थप्पड़कांड का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है. वीडियो में नजर आ रहा है कि मंदिर परिसर में स्थित पार्क में प्रेमी युगल बैठा है. इसी दौरान एक महिला वहां आपत्ति जताती है, हंगामा होता है और फिर सुरक्षाकर्मी मौके पर पहुंचते हैं. महिला की आपत्ति के बाद सुरक्षा गार्ड ने लड़की के साथ बैठे युवक को थप्पड़ मार दिया. सवाल यह नहीं है कि प्रेमी युगल वहां क्या कर रहा था. सवाल यह है कि अगर सुरक्षाकर्मी को उनका व्यवहार आपत्तिजनक लगा तो उसने थप्पड़ मारने का अधिकार आखिर किस कानून के तहत हासिल कर लिया? क्या किसी शख्‍स का सार्वजनिक स्थान पर बैठना, बातचीत करना या प्रेमी युगल के रूप में दिखाई देना अपने आप में अपराध है? और अगर उनके व्यवहार में असल में अश्लीलता थी तो क्या उसका फैसला मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मी करेगा या कानून के मुताबिक कार्रवाई पुलिस करेगी?

क्या सिक्योरिटी गार्ड कानून से ऊपर हो गया?
देखा जाए तो सुरक्षा गार्ड का काम परिसर की सुरक्षा व्यवस्था संभालना है. वह किसी को नियमों का उल्लंघन करने पर रोक सकता है, पूछताछ कर सकता है और जरूरत पड़ने पर परिसर से बाहर जाने के लिए कह सकता है. लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि वह किसी व्यक्ति को सजा देने के लिए थप्पड़ भी मार सकता है? यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है. अगर किसी शख्‍स ने कोई अपराध किया है तो उसकी जांच और कार्रवाई की एक कानूनी प्रक्रिया है. किसी निजी व्यक्ति, सुरक्षा गार्ड या भीड़ को मौके पर ही फैसला सुनाकर सजा देने का अधिकार नहीं मिल जाता. अगर ऐसा होने लगे तो फिर कानून और भीड़ के फैसले में अंतर ही क्या रह जाएगा?

अगर अश्लीलता हुई थी तो पुलिस क्यों नहीं?
मान लिया जाए कि प्रेमी युगल सार्वजनिक स्थान पर ऐसा कोई कृत्य कर रहा था, जिसे कानून अश्लील मानता है तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 296 सार्वजनिक स्थान पर दूसरों को परेशान करने वाला अश्लील कृत्य करने पर अधिकतम तीन महीने की जेल, एक हजार रुपये तक जुर्माना या दोनों का प्रावधान करती है. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि कानून में सजा का प्रावधान होना किसी सिक्योरिटी गार्ड को खुद सजा देने का अधिकार नहीं देता. इसलिए सवाल सीधा है कि अगर सुरक्षाकर्मी को लगा कि कानून का उल्लंघन हुआ है तो उसे पुलिस को बुलाना चाहिए था. क्या विश्वविद्यालय प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को मौके पर नहीं बुलाया जा सकता था? क्या प्रेमी युगल को वहां से हटाकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता था?

थप्पड़ क्या सिर्फ एक थप्पड़ है?
सोशल मीडिया पर कुछ तो यहां तक कह रहे हैं कि अच्‍छा किया थप्‍पड़ मारकर सबक सिखाया, लेकिन यह कानूनन तो गलत ही है ना. सवाल थप्पड़ से बढ़कर किसी शख्‍स के अधिकार का है. भारतीय न्याय संहिता (BNS) में किसी व्यक्ति की सहमति के बिना जानबूझकर ऐसी ताकत का इस्तेमाल करना, जिससे चोट, डर या परेशानी पैदा हो सकती है, क्रिमिनल फोर्स की श्रेणी में आ सकता है. यानी मामला केवल इतना नहीं है कि गार्ड ने एक थप्पड़ मारा. सवाल यह है कि क्या उसे ऐसा करने का कानूनी अधिकार था? किसी व्यक्ति पर हाथ उठाने का अधिकार कानून ने दिया है या केवल वर्दी, पद और परिसर की जिम्मेदारी ने उसे यह अधिकार दे दिया?

इस घटना को लेकर कुछ और वाजिब सवाल भी खड़े होते हैं.

क्या सुरक्षाकर्मी ने पहले युवक और युवती से पूरी बात पूछी?

क्या उन्हें चेतावनी दी गई?

क्या विश्वविद्यालय के नियमों के बारे में बताया गया?

क्या उन्हें वहां से जाने के लिए कहा गया?

और अगर उन्होंने मना किया तो क्या पुलिस या विश्वविद्यालय के सीनियर अधिकारियों को बुलाया गया?

Source

dainikupeditor@gmail.com

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