नई दिल्ली. कल्पना कीजिए एक ऐसे दौर की, जब सिनेमाघरों की रोशनी डिम होते ही पर्दे पर तकनीक का कोई चमत्कार नहीं, बल्कि एक तिलिस्मी दुनिया उतर आती थी. साल 1932, भारतीय सिनेमा के इतिहास का वो शुरुआती और रोमांचक काल, जब पर्दे के कलाकारों ने पहली बार बोलना और गाना शुरू किया था. इस दौर में भारतीय सिनेमा के इतिहास से कुछ ऐसी कालजयी फिल्में निकलीं जिनका आजतक कोई मुकाबला नहीं कर पाया. आज हिंदी सिनेमा के इतिहास से आपके लिए वो फिल्म निकालकर लाए हैं जिसके बारे में आप शायद ही जानते होंगे.
आज जिस फिल्म की बात कर रहे हैं वो ब्लैक एंड व्हाइट के दौर से निकली कालजयी फिल्म है. 1932 में आई म्यूजिकल रोमांटिक फिल्म ‘इंद्रसभा’ की बात करें तो इस फिल्म के नाम एक बेहद खास रिकॉर्ड है जिसका जिक्र कहानी में आगे करेंगे, लेकिन उससे पहले ये जान लीजिए कि इस फिल्म को किसने बनाया और कब बनाया.
1931 में भारत की पहली बोलने वाली फिल्म ‘आलम आरा’ आई थी. उसी के साथ फिल्मों में बोलने का चलन शुरू हुआ था. डायलॉग्स और गाने आने लगे थे जिससे न सिर्फ थिएटर्स में भीड़ जमा हो रही थी, बल्कि लोग पूरी कहानी तक बंधने लगे थे. वो वक्त था साढ़े तीन, पौने चार घंटे की फिल्म का और लोग आखिर तक सीट से उठते नहीं थे. पहली-पहली बार जब दर्शकों ने पर्दे पर गाना देखना शुरू किया तो वो मंत्रमुग्ध सा होने लगे.
कोलकाता के थिएटर कलाकारों ने रचा इतिहास
इसी दौर में कोलकाता की मशहूर कंपनी ‘मदन थिएटर्स’ ने एक ऐसी फिल्म बनाई जिसने इतिहास रच दिया. इस फिल्म का नाम ‘इंद्रसभा’ था. यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि रंगमंच और सिनेमा का एक जबरदस्त मेल थी. साल 1853 में लखनऊ के जाने-माने शायर आगा हसन ‘अमानत’ ने इसे एक उर्दू नाटक के रूप में लिखा था. तब यह नाटक नवाब वाजिद अली शाह के दरबार की शान हुआ करता था. पारसी थिएटर वालों ने इसे देश के कोने-कोने में पहुंचाया और जब फिल्मों में बोलने का दौर आया, तो इसे पूरी शिद्दत के साथ बड़े पर्दे पर उतारा.
पर्दे पर उतारी परलोक की कहानी
कहानी शुरू होती है स्वर्ग के राजा इंद्र की सभा से. वहां चारों तरफ अप्सराओं का नाच, संगीत और परियों की मस्ती चलती रहती है. असली ट्विस्ट तब आता है जब एक खूबसूरत परी को जमीन के एक राजकुमार से प्यार हो जाता है. अब स्वर्ग के नियम तो भाई प्यार की इजाजत देते नहीं! यहीं से शुरू होता है देवताओं का गुस्सा, प्यार की कड़ी परीक्षा और परियों की दुनिया का असली ड्रामा.
‘इंद्रसभा’ में थे 72 गाने, आजतक नहीं टूटा रिकॉर्ड
आजकल जहां एक फिल्म में 5-6 गाने होते हैं तो उसे बहुत माना जाता है. लगता है कि फिल्म गानों से भरी हुई है, लेकिन 1932 की ‘इंद्रसभा’ में एक दो या तीन नहीं बल्कि 72 गाने थे. इस फिल्म का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड’ रिकॉर्ड्स में शामिल है. फिल्म के कुल 72 गाने हैं जिनमें 31 गजलें, 9 ठुमरियां और 4 होली गीत शामिल है. ‘इंद्रसभा’ की लंबाई लगभग 3 घंटे 51 मिनट थी. फिल्म में गीतों की संख्या इतनी अधिक थी कि ये अपने दौर की सबसे अलग प्रस्तुतियों में गिनी गई. इस फिल्म को आज भी सबसे यादगार फिल्मों में गिना जाता है.
फिल्म में मास्टर निसार और जहानारा कज्जन जैसे कलाकार नजर आए थे. जहानारा कज्जन उस दौर की लोकप्रिय गायिका-अभिनेत्रियों में गिनी जाती थीं. उनकी और निसार की जोड़ी ने शुरुआती बोलती फिल्मों के संगीत को लोकप्रिय बनाने में योगदान दिया.











