जौनपुर: उत्तर प्रदेश का जौनपुर जिला अपनी ऐतिहासिक इमारतों के साथ-साथ अदब, शायरी और गंगा-जमुनी तहजीब के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. इस मिट्टी ने कई ऐसे अजीम फनकारों को जन्म दिया है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया. इन्हीं महान विभूतियों में से एक थे मशहूर प्रगतिशील शायर वामिक जौनपुरी. वरिष्ठ अधिवक्ता जय प्रकाश सिंह ने वामिक साहब के जीवन, उनकी सादगी और जौनपुर के प्रति उनके अगाध प्रेम को याद करते हुए बताया कि उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ी प्रेरणा है.
जय प्रकाश सिंह ने बताया कि वामिक जौनपुरी साहब हमारे जिले के सच्चे गौरव हैं. उन्होंने पूरी दुनिया में जहां भी अपनी शायरी का परचम लहराया, उन्होंने अपने नाम वामिक के साथ हमेशा जौनपुरी शब्द को जोड़े रखा. उनका अपने नाम के आगे जौनपुरी लिखना ही इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि उन्हें अपनी मातृभूमि और अपनी जड़ों से कितना गहरा लगाव था. वे केवल देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर के एक बहुत बड़े साहित्यकार और शायर थे.
जब वामिक साहब की एक नज़्म ने जुटाया था लाखों का फंड
वामिक साहब की शायरी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने कभी भी दौलत, शोहरत या किसी की चाटुकारिता के लिए नहीं लिखा. उनकी रचनाएं सीधे तौर पर आम जनता की जिंदगी, उनके संघर्षों और उनसे जुड़े जमीनी सवालों को समर्पित थीं.
उस दौर में जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था, तब प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा (IPTA) जैसे संगठनों ने अकाल पीड़ितों की मदद के लिए सभी कवियों और शायरों को एक ‘समूह गान’ लिखने की चुनौती दी थी. सैकड़ों साहित्यकारों ने इस पर अपनी कलम चलाई, लेकिन जो लोकप्रियता वामिक साहब की नज़्म ने बटोरी, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती. उनकी वह मशहूर नज़्म थी:
भूखा है बंगाल रे साथी, भूखा है बंगाल.
सूख गए सब ताल-तलैया, ऐसा पड़ा अकाल रे साथी, भूखा है बंगाल
जिन हाथों ने मोती रोले, आज वही कंगाल रे साथी, भूखा है बंगाल.
इस नज़्म में बंगाल के दर्द का ऐसा जीवंत रूप था कि उस जमाने में कलाकारों और आम लोगों ने डफली बजाकर, सड़कों और गलियों में इसे गा-गाकर लोगों से मदद की अपील की, जिससे पीड़ितों के लिए उस दौर में लाखों-लाख रुपये का फंड इकट्ठा हुआ था.
मुंबई की चकाचौंध और मायानगरी को ठुकराया
जय प्रकाश सिंह ने बताया कि वामिक साहब के समकालीन और अजीज दोस्त जैसे मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी और अली सरदार जाफ़री जैसी नामचीन हस्तियां फिल्म इंडस्ट्री का रुख कर चुकी थीं और वहां बड़ी कामयाबी हासिल कर रही थीं. उनके दोस्तों ने वामिक साहब को भी बार-बार मुंबई आने का न्योता दिया. मगर मायानगरी की वह चमक-दमक और भारी-भरकम पैसा वामिक साहब को कभी अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका.
कजगांव की मिट्टी से आखिरी सांस तक वफ़ादारी
उन्हें अपने वतन की मिट्टी से इस कदर मोहब्बत थी कि वे जौनपुर शहर को छोड़कर अपने पैतृक कस्बे कजगांव की कोठी में ही रहे. उस दौर में कजगांव जैसे ग्रामीण इलाके में बमुश्किल तीन से चार घंटे ही बिजली आती थी. दूसरी तरफ, वामिक साहब के बेटे सिंगरौली के कोल माइंस में चीफ इंजीनियर के पद पर तैनात थे, जहां उनके पास ऐशो-आराम की हर सुख-सुविधा मौजूद थी. वे चाहते तो बहुत ही आलीशान जिंदगी जी सकते थे, लेकिन उन्होंने कजगांव की सादगी और अपने वतन की मिट्टी को ही सर्वोपरि माना और वहीं रहकर साहित्य की सेवा की.











