Bihar MLC Election: अरविंद शर्मा ने MLC चुनाव के लिए भरा पर्चा; कैसे होता है बिहार विधान परिषद का चुनाव? जानें पूरी प्रक्रिया

Bihar MLC Election: बिहार की राजनीति में इन दिनों विधान परिषद (MLC) उप-चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज है। भारतीय जनता पार्टी ने अपने पुराने और समर्पित कार्यकर्ता अरविंद शर्मा को मैदान में उतारा है। अरविंद शर्मा ने गुरुवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और NDA के दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। 

भूमिहार जाति से आने वाले अरविंद शर्मा को टिकट देकर भाजपा ने न केवल अपने पुराने कार्यकर्ताओं को एक मजबूत संदेश दिया है, बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग की नाराजगी को दूर करने की भी कोशिश की है। संख्या बल के हिसाब से अरविंद शर्मा की जीत लगभग तय मानी जा रही है, क्योंकि विपक्ष के पास फिलहाल उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारने के लिए पर्याप्त विधायक नहीं हैं।

क्या है विधान परिषद और कैसे होता है इसका गठन? 

बता दें, भारत के 6 राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था है, जिनमें बिहार भी शामिल है। विधान परिषद को ‘उच्च सदन’ कहा जाता है। यह एक स्थायी सदन है, जिसे कभी भंग नहीं किया जा सकता। एमएलसी का औहदा विधायक (MLA) के बराबर ही होता है। हालांकि इनका कार्यकाल 6 साल के लिए होता है और हर दो साल में इसके एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

बिहार विधान परिषद की बात करें तो यहां कुल 75 सीटें हैं, जिनमें 27 सदस्‍य बिहार विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाते है। 24 सदस्य स्‍थानीय प्राधिकार से यानी नगर निगम, पंचायत और जिला परिषद के प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं। वहीं, 12 सदस्यों को राज्यपाल नामित करते हैं, जबकि 6 सदस्य शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से और 6 स्‍नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाते हैं। 

MLC चुनाव की वोटिंग प्रक्रिया

विधान परिषद का चुनाव आम चुनाव (लोकसभा या विधानसभा) से काफी अलग होता है। इसमें आम जनता सीधे वोट नहीं करती।

1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote)

इस चुनाव में जीत का फैसला ‘एकल संक्रमणीय अनुपातिक मतदान’ के आधार पर होता है। इसमें मतदाता केवल एक उम्मीदवार को वोट नहीं दिया जाता, बल्कि बैलेट पेपर पर मौजूद सभी उम्मीदवारों को अपनी पसंद के आधार पर वरीयता (Preference) दी जाती है।

2. वरीयता का चुनाव 

वोटर को बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों के नाम के आगे 1, 2, 3 जैसे अंक लिखकर अपनी प्राथमिकता बतानी होती है। यदि किसी मतदाता ने केवल अपनी पहली पसंद चुनी है और अन्य को खाली छोड़ दिया है, तो भी उसका वोट मान्य होता है।

3. जीत का कोटा 

विजेता बनने के लिए एक निश्चित संख्या में वोटों की आवश्यकता होती है, जिसे ‘कोटा’ कहा जाता है। इसकी गणना एक विशेष फॉर्मूले से की जाती है। इसमें वोटर को अधिकार होता है कि वह तय कर सकें कि किस प्रत्याशी को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं और किसे कमतर। बैलेट पेपर पर वरीयता क्रम में वोटर अपनी पसंद का इजहार रोमन अंकों में करते हैं। 

ऐसे में यदि पहली पसंद के वोटों से कोई उम्मीदवार कोटा हासिल नहीं कर पाता, तो सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर कर दिया जाता है और उसके वोट अन्य उम्मीदवारों को उनकी अगली वरीयता के आधार पर ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक विजेता का फैसला न हो जाए। 

अरविंद शर्मा का राजनीतिक सफर 

अगर बात करें, जहानाबाद के बंभई गांव के निवासी अरविंद शर्मा भाजपा के जमीनी स्तर के नेता माने जाते हैं। उन्होंने जिला अध्यक्ष से लेकर प्रदेश कार्यालय प्रभारी तक की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है। मंगल पांडेय के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर BJP ने उन्हें मौका देकर यह साबित किया है कि पार्टी अपने पुराने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को भूली नहीं है। भूमिहार समाज से आने के कारण उनकी उम्मीदवारी को आगामी चुनावों के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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dainikupeditor@gmail.com

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