पदक जीतने के बाद भी दबाव क्यों? एशियाड विजेताओं से आचार्य प्रशांत का संवाद

ग्रेटर नोएडा. एशियाई खेलों में भारत को सॉफ्ट टेनिस का पहला पदक दिलाने वाले जय मीणा के लिए क्वार्टर फाइनल लंबे समय से एक मानसिक बाधा रहा है. उन्हें लगता था, जैसे निर्णायक मुकाबला आते ही उनके हाथों में बेड़ियां पड़ जाती हैं. इसी दबाव को समझने के लिए रविवार को वह अपने 16 वर्ष पुराने कोच सुदेश सांगते के साथ दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत के संवाद सत्र में पहुंचे. उनके साथ कॉमनवेल्थ पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण और रजत जीतने वाले उत्तम सिंह रावत भी थे. दोनों खिलाड़ी पदक जीत चुके थे, लेकिन दोनों के सवाल अलग थे. एक जानना चाहता था कि जीत का दबाव खेल को क्यों बदल देता है, दूसरा यह कि अपने बड़े लक्ष्य हासिल कर लेने के बाद जीवन को कैसे संभाला जाए.

ग्रेटर नोएडा के आईआईएमटी लैडर बिजनेस फाउंडेशन परिसर में आयोजित ‘संत सरिता’ सत्र तीन घंटे से कुछ अधिक चला. शुरुआत के करीब डेढ़ घंटे आचार्य प्रशांत ने सूफी कवि बुल्ले शाह की काफ़ी ‘बुल्ला की जाणा मैं कौण’ की व्याख्या की. इसके बाद खिलाड़ियों और अन्य प्रतिभागियों के प्रश्न लिए गए. आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र तथा प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने खेल की चर्चा को केवल प्रतिस्पर्धा या मनोबल तक सीमित नहीं रखा. उनका तर्क था कि खिलाड़ी मैदान पर जिस भय, लालच और दबाव से जूझता है, उसकी जड़ें उसके रोजमर्रा के जीवन में होती हैं.

बुल्ले शाह से शुरुआत: सुख-दुख का केंद्र कौन?
सत्र के पहले हिस्से में आचार्य प्रशांत ने पूछा कि जो व्यक्ति सुखी या दुखी होता है, वह अपनी पहचान कहां से पाता है. जाति, धर्म, परिवार, रंग, देश और सामाजिक परिस्थितियों से मिली पहचान को मनुष्य अपनी सच्चाई मान लेता है. फिर जो घटना उस पहचान के पक्ष में जाती है, वह सुख का कारण बनती है और जो उसके विरुद्ध जाती है, वह दुख का. उन्होंने कहा, “सारी खुशी आत्मरक्षण की राहत मात्र है.” उदाहरण देते हुए समझाया कि एक ही खेल का परिणाम किसी टीम के समर्थकों को प्रसन्न करता है और दूसरी टीम के समर्थकों को दुखी. घटना एक है, लेकिन उसे देखने वाले की पहचान बदलते ही उसका अर्थ बदल जाता है.

इसी संदर्भ में उन्होंने धर्म की परंपरागत समझ पर भी सवाल उठाया. उनका कहना था, “धर्म जिसका उद्देश्य है अहंकार का हटना, वो धर्म अहंकार की सबसे बड़ी ढाल और सबसे मोटा कवच होता है.” उनके अनुसार स्वयं को धार्मिक मानना और अपने भीतर के भय, पूर्वाग्रह तथा स्वार्थ को पहचानना दो अलग बातें हैं. उन्होंने आत्मनिरीक्षण के दो पक्ष बताए. पहला, अपने भीतर जो चल रहा है उसे ईमानदारी से देखना. दूसरा, जो गलत दिखाई दे, उससे जुड़ाव छोड़ने का निर्णय लेना. एक महिला प्रतिभागी ने पूछा कि आत्मनिरीक्षण में बार-बार स्वार्थ ही दिखाई देने पर आगे कैसे बढ़ा जाए. उन्होंने कहा कि जो गलत दिखाई दे उसे छोड़ना महत्वपूर्ण है, उसके बाद अपने भविष्य को सुरक्षित रखने की चिंता भी अहंकार का हिस्सा बन सकती है. इसी विचार को उन्होंने आगे खेलों से जोड़ा.

जय मीणा: कांस्य पक्का होते ही बदल गई मानसिकता
मध्य प्रदेश के देवास निवासी 26 वर्षीय जय मीणा ने 23 सितंबर को आइची-नागोया एशियाई खेलों के पुरुष एकल सेमीफाइनल में जापान के ताकुया कुरोसाका से 2-4 से हारकर कांस्य पदक जीता था. यह एशियाई खेलों में भारत का पहला सॉफ्ट टेनिस पदक था. इससे पहले वह 2018 और हांगझोऊ एशियाई खेलों में भी हिस्सा ले चुके थे.

जय ने बताया कि इस बार भी पदक तक पहुंचने से पहले कई निराशाजनक मुकाबले हुए. उनके अनुसार एक मैच हारने के बाद साथी खिलाड़ी इतने दुखी थे कि खेल की पोशाक पहने ही रोते-रोते सो गए. पहले भी वह क्वार्टर फाइनल में महत्वपूर्ण मुकाबले हार चुके थे. बार-बार चूकने से उन्हें अपने खेल और अपनी क्षमता पर संदेह होने लगा था.

जय ने कहा कि बचपन में खिलाड़ी आनंद के लिए खेलना शुरू करता है, लेकिन आगे चलकर देश का प्रतिनिधित्व करने और पदक जीतने की जिम्मेदारी कभी-कभी बोझ बन जाती है. उनके साथ भी ऐसा ही हुआ. निर्णायक मैच में हारने का भय इतना बढ़ जाता था कि जोखिम लेने की क्षमता प्रभावित होती थी.

इस बार क्वार्टर फाइनल जीतकर जब कांस्य पक्का हुआ तो उन्होंने पिता से कहा, “अब मैं खुद के लिए खेलूंगा.” जय के अनुसार इसके बाद वह सेमीफाइनल में पहले से अधिक खुलकर खेले. जापानी प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ तीन गेम से पिछड़ने के बाद भी उन्होंने वापसी की. हालांकि अंततः हार गए. उन्होंने बताया कि उस समय वह टाइफाइड और शारीरिक कमजोरी से भी जूझ रहे थे. भोजन की उपलब्धता और अपनी परिचित खुराक न मिल पाने की कठिनाइयों का भी उन्होंने उल्लेख किया.

आचार्य प्रशांत ने इसी अनुभव पर सवाल उठाया, “मैं पूछूंगा प्रेशर था ही क्यों?”
उनका तर्क था कि कांस्य पक्का होने के बाद यदि खिलाड़ी स्वयं को स्वतंत्र महसूस करता है तो यह भी बताता है कि उससे पहले वह परिणाम को लेकर बंधा हुआ था. उन्होंने कहा, “गोल्ड का फाइनल वैसा ही खेलो जैसा ब्रॉन्ज का मैच खेला था और ब्रॉन्ज का मैच वैसा ही खेलो जैसा प्रैक्टिस में खेलते हो.” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका आशय किसी विशेष टूर्नामेंट के लिए उत्साह बढ़ाना नहीं है. “जैसा बंदा होता है जिंदगी के मैदान पर, वैसा ही बंदा होता है खेल के मैदान पर.” उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में भय और स्वार्थ से संचालित होता है, तो किसी बड़े मुकाबले में अचानक निर्भय नहीं हो सकता.

आचार्य प्रशांत ने जय से कहा, “अगर अच्छा खिलाड़ी बनना है तो अच्छा इंसान बनो. खेल के मैदान पर 100% देना है तो जिंदगी के मैदान पर 100% देना सीखो.” उनका कहना था कि उत्कृष्टता को कुछ चुनिंदा अवसरों के लिए सुरक्षित नहीं रखा जा सकता. जो खिलाड़ी साधारण अभ्यास और छोटे मुकाबलों में अपनी पूरी क्षमता लगाने का अभ्यस्त है, उसके सामने बड़े टूर्नामेंट में अचानक कुछ अतिरिक्त कर दिखाने का मनोवैज्ञानिक दबाव नहीं आना चाहिए. उन्होंने इसे केवल खेल की नहीं, व्यक्ति के संपूर्ण जीवन की समस्या बताया.

शारीरिक सीमा और मानसिक प्रयास में अंतर
हालांकि हर मुकाबले में शत-प्रतिशत देने के विचार पर शारीरिक प्रशिक्षण का प्रश्न भी उठता है. खेल-विज्ञान में अभ्यास, थकान, आराम और प्रतियोगिता से पहले प्रशिक्षण का भार घटाने का महत्व स्वीकार किया जाता है. वर्ष 2007 में ‘मेडिसिन एंड साइंस इन स्पोर्ट्स एंड एक्सरसाइज’ में प्रकाशित लॉरेंट बॉस्के और उनके सहयोगियों के एक मेटा-विश्लेषण के अनुसार बड़े मुकाबले से पहले लगभग दो सप्ताह तक प्रशिक्षण की मात्रा 41 से 60 प्रतिशत घटाना प्रदर्शन के लिए लाभकारी हो सकता है, यदि तीव्रता और आवृत्ति बनाए रखी जाए.

लेकिन अध्ययन का विषय प्रशिक्षण का शारीरिक भार था, जबकि आचार्य प्रशांत अपने उत्तर में मनोवैज्ञानिक प्रयास पर जोर दे रहे थे. उन्होंने स्वयं इस भेद को स्पष्ट किया. उनका कहना था कि टाइफाइड, चोट या शारीरिक कमजोरी की स्थिति में कितना खेलना चाहिए, यह कोच और खेल-चिकित्सक का विषय है. “मैं अभी बात उसकी कर रहा हूं जो भीतर बैठकर के गणनाएं करता है.”

इस प्रकार उनका शत-प्रतिशत प्रयास का आग्रह शारीरिक क्षमता को अनदेखा करने के बजाय भय और परिणाम की चिंता के कारण जानबूझकर पीछे हटने की प्रवृत्ति पर केंद्रित था. हालांकि ऐसी सलाह खिलाड़ी के मानसिक दबाव या प्रदर्शन को किस हद तक बदल सकती है, इसका आकलन केवल इस संवाद के आधार पर नहीं किया जा सकता.

कोच की कहानी: जिस अखबार में पदक की तस्वीर छपी, वही बेचते थे
जय के कोच सुदेश सांगते ने बताया कि उन्होंने पिछले 16 वर्षों से जय को प्रशिक्षण दिया है. वह स्वयं राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं और मध्य प्रदेश सरकार से खेल-संबंधी सम्मान प्राप्त कर चुके हैं. सांगते के अनुसार जय बचपन में काफी शरारती थे और चौथी कक्षा में उन्हें एक स्कूल से निकाल दिया गया था. पिता उन्हें दूसरे स्कूल ले गए, जहां सॉफ्ट टेनिस से उनका परिचय हुआ. कोच ने इसी ऊर्जा को खेल में लगाने की कोशिश की. सांगते ने अपने संघर्ष का भी उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि जब वह राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर लौटते थे और अखबार में उनकी तस्वीर छपती थी, तो वही अखबार उन्हें बस स्टैंड पर बेचने पड़ते थे.

इस पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि जीवन की ऊंचाई हमेशा पदक के रूप में नहीं दिखाई देती. कई बार कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते रहने में उससे बड़ी गरिमा होती है. उन्होंने कोच से कहा कि खिलाड़ी तैयार करना और फिर उन खिलाड़ियों के माध्यम से अगली पीढ़ी को तैयार करना भी सफलता का एक रूप है. जय और सांगते ने बताया कि देवास की उनकी अकादमी में लगभग 250 से 300 बच्चे निःशुल्क अभ्यास करते हैं. खेल के महंगे उपकरण उपलब्ध कराने से लेकर मैदान और बिजली का खर्च उठाने तक कई चुनौतियां हैं. सांगते के अनुसार मैदानों की फ्लडलाइट पर ही हर महीने लगभग 40 से 50 हजार रुपये खर्च होते हैं. जय ने बताया कि उन्हें स्वयं वर्षों तक निःशुल्क प्रशिक्षण मिला और स्कूल की पढ़ाई में भी सहायता दी गई.

खेल सुविधाओं की कमी पर चर्चा करते हुए आचार्य प्रशांत ने कहा कि उत्कृष्ट खिलाड़ी का कर्तव्य अपने बाद आने वालों के लिए अवसर तैयार करना भी है. उन्होंने जय और उनके कोच से भविष्य में अधिक कोर्ट बनाने और खेल का प्रसार करने को कहा. जय ने सत्र में हांगझोऊ एशियाई खेलों के भारतीय दल की जर्सी विशेष रूप से आचार्य प्रशांत को भेंट की. उन्होंने बाद में एक वीडियो संदेश में कहा, “मैं स्पेशली सर के लिए लेकर आया था.” जय और सांगते ने मंच पर आचार्य प्रशांत के हाथों अपने पदक भी ग्रहण किए.

सात साल से देख रहे थे वीडियो, मैच से पहले याद आई एक बात
सत्र से पहले पत्रकारों से बातचीत में जय ने बताया कि वह करीब छह-सात वर्षों से आचार्य प्रशांत के वीडियो देखते रहे हैं. उनके परिवार और कोच को भी उनके विचारों की जानकारी है. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में एक टूर्नामेंट के दौरान मैच से पहले देखा गया वीडियो याद किया. उनके अनुसार आचार्य प्रशांत ने उसमें कहा था, “अगर इंसान को अपने काम की समझ आ जाए, तो वह समझ ही उसके लिए प्रेरणा बन जाती है.” जय का कहना था कि इस विचार ने उन्हें खेल के उद्देश्य को लेकर सोचने में मदद की. वह इस बात से सहमत थे कि अपने काम का महत्व समझने वाला व्यक्ति हमेशा बाहरी प्रेरणा पर निर्भर नहीं रहता.

यह परिचय अक्टूबर के सत्र से पहले का था. जय ने बताया कि जब आचार्य प्रशांत की टीम से निमंत्रण आया तो उन्होंने सबसे पहले अपने कोच को फोन किया. उन्होंने मंच पर अपनी कुछ ऐसी असुरक्षाओं की चर्चा भी की जिनके बारे में पहले खुलकर बात नहीं की थी. उनके अनुसार सार्वजनिक रूप से इन्हें स्वीकार करना आसान नहीं था.

कॉमनवेल्थ विजेता से कहा: ‘सेटल मत होइए’
दूसरे खिलाड़ी, 43 वर्षीय उत्तम सिंह रावत, पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं और फिलहाल गाजियाबाद में रहते हैं. वह एक निजी सुरक्षा कंपनी में वरिष्ठ क्षेत्रीय प्रबंधक हैं. नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने पावरलिफ्टिंग में अपना स्थान बनाया. उत्तम ने बताया कि कुछ वर्ष पहले उनका वजन लगभग 105 किलो था. लगभग 25 किलो वजन घटाने के बाद उन्होंने अपने परिवार के एक अनुभवी खिलाड़ी और प्रशिक्षक की मदद से पावरलिफ्टिंग शुरू की. राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे. कनाडा के विनिपेग में आयोजित कॉमनवेल्थ पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में मास्टर्स-1 आयुवर्ग के 83 किलो वर्ग में उन्होंने इक्विप्ड पावरलिफ्टिंग में स्वर्ण तथा क्लासिक बेंच प्रेस में 117.5 किलो भार उठाकर रजत पदक प्राप्त किया.

उन्होंने बताया कि नौकरी में हजारों कर्मचारियों की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद वह वर्षों से शाम को नियमित अभ्यास करते रहे. अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय राष्ट्रगान सुनना उनका सपना था, जो स्वर्ण जीतने के बाद पूरा हुआ. उनके अनुसार प्रतियोगिता में रणनीति, वजन प्रबंधन और अंतिम प्रयास में उठाए गए अतिरिक्त भार की महत्वपूर्ण भूमिका रही. सत्र से पहले पत्रकारों से उन्होंने कहा था कि नौकरी, परिवार और खेल में अपने अधिकांश लक्ष्य प्राप्त कर लेने के बाद अब इच्छा है कि जीवन में जो संतुलन आया है, वह बना रहे. उनका सवाल था, “उसको बैलेंस कैसे करना है? सेट कैसे करके रखना है? भटकूं ना.”

आचार्य प्रशांत ने बधाई देने के बाद उत्तर दिया, “सेटल मत होइए.”
उन्होंने कहा कि लक्ष्य प्राप्त कर लेने के बाद ठहर जाने की इच्छा स्वाभाविक लग सकती है, लेकिन जीवन को किसी उपलब्धि पर समाप्त नहीं मान लेना चाहिए. पहाड़ पर चढ़ने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक ऊंचाई के बाद नई चुनौती सामने आती है. उनका तर्क था कि उपलब्धि मिलने के बाद व्यक्ति चाहे तो अगला पदक जीतने का लक्ष्य बनाए, नई प्रतिभाएं तैयार करे या जीवन के किसी दूसरे क्षेत्र में सार्थक काम शुरू करे. उन्होंने कहा, “सफर में बने रहना ही मंजिल है.” उत्तम ने भी मंच पर आचार्य प्रशांत के हाथों अपने पदक ग्रहण किए.

दोनों खिलाड़ियों को मिले उत्तरों में एक साझा बात थी. जय से कहा गया कि पदक के परिणाम के कारण अपने खेल को न बदलें, जबकि उत्तम से कहा गया कि पदक मिलने के बाद जीवन को ठहरा हुआ न मानें. एक के सामने परिणाम पाने की बेचैनी थी, दूसरे के सामने परिणाम पा लेने के बाद उसे संभालकर रखने की इच्छा.

प्रेरणा नहीं, स्पष्टता: श्रोताओं ने बताई अपनी समझ
कार्यक्रम से पहले और बाद में पत्रकारों ने कई उपस्थित लोगों से बातचीत की. उनमें विभिन्न पेशों के लोग, विद्यार्थी और फाउंडेशन के कर्मचारी शामिल थे. बेंगलुरु से आए एक प्रतिभागी ने कहा कि नई पीढ़ी के धर्म से दूर होने के पीछे अंधविश्वास, धार्मिक संप्रदायों की गतिविधियां और धर्म के नाम पर हिंसा भी कारण हैं. उनके अनुसार बहुत से युवा धार्मिक पहचान से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन स्वयं को समझने की इच्छा उनमें बनी रहती है. फॉरेस्ट्री साइंस के शोधार्थी सागर ने कहा, “भक्ति का जो वास्तविक मतलब है, वो स्वयं को जानना होता है.” हालांकि उनका यह भी कहना था कि लोग धार्मिक व्यक्तियों, सार्वजनिक हस्तियों और अन्य प्रभावशाली लोगों के प्रति बिना जांचे-परखे निष्ठा विकसित कर लेते हैं.

प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन में काम करने वाली रेणुका ने बताया कि पहले धर्म में उनकी रुचि नहीं थी. धार्मिक परंपराओं में महिलाओं पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध उन्हें विशेष रूप से परेशान करते थे. उनके अनुसार आचार्य प्रशांत को सुनने और गीता पढ़ने के बाद उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन आया. उन्होंने कहा, “आचार्य जी कहते हैं कि मंदिर वो जगह है जो आपके बंधन काट दे.” जयपुर की आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. पूजा सक्सेना ने बताया कि वह अपने पेशे में बाहरी उत्साह से अधिक कार्य के उद्देश्य को समझने पर जोर देती हैं. उन्होंने कहा, “अब मुझे किसी भी बाहरी मोटिवेशन की जरूरत नहीं है.”

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के शोधार्थी भुवन ने बताया कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्होंने आचार्य प्रशांत के वीडियो देखने शुरू किए थे. उनके अनुसार अन्य प्रेरक वक्ताओं से अंतर यह लगा कि यहां केवल मेहनत करते रहने का उत्साह नहीं दिया जाता, बल्कि व्यक्ति से अपने लक्ष्य, क्षमता और निर्णय की जांच करने को कहा जाता है. उन्होंने कहा, “मोटिवेशन की बात अलग होती है और एक मिरर की बात अलग होती है कि आपको ही आप तक पहुंचा दिया गया हो.”

फाउंडेशन से जुड़े एक कर्मचारी ने इसी अंतर को इन शब्दों में व्यक्त किया, “मोटिवेशन का बाप होता है क्लैरिटी.” इन बातचीतों में प्रेरणा की जगह स्पष्टता पर बार-बार जोर सामने आया. हालांकि ये विचार मुख्यतः आचार्य प्रशांत से पहले से जुड़े लोगों के थे. इसलिए इन्हें उनके शिक्षण के प्रभाव पर स्वतंत्र निष्कर्ष के बजाय प्रतिभागियों के अनुभव और धारणाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

पढ़ाई जारी रखी, परिवार का विरोध झेला, स्पोर्ट्स बाइक खरीदी
नोएडा में रहने वाली अकाउंटेंट विशाखा ने बताया कि ग्रामीण परिवेश में उनका जीवन परिवार के पुरुषों के निर्णयों से नियंत्रित होता था. पिता, भाई और परिवार के दूसरे पुरुषों की इच्छा के विरुद्ध पढ़ाई जारी रखना भी आसान नहीं था. उन्होंने कहा कि परिवार से आर्थिक सहायता बंद होने के बाद भी उन्होंने आगे पढ़ाई की, छोटे-छोटे पाठ्यक्रम पूरे किए, ट्यूशन पढ़ाया और बाद में नौकरी करने लगीं. उन्होंने अपनी कमाई से स्पोर्ट्स बाइक खरीदी तो विरोध हुआ. उनके अनुसार लोगों ने ताना मारा, “एक लड़की होकर इतनी स्पोर्ट्स वाली बाइक चलाती है.” विशाखा ने इन बदलावों को आचार्य प्रशांत को सुनने के बाद विकसित हुई अपनी समझ से जोड़ा. उनका अनुभव उन अनेक व्यक्तिगत कथाओं में से एक था, जिन्हें उपस्थित लोगों ने पत्रकारों के सामने रखा.

आचार्य प्रशांत की मां से सवाल: हर पल 100 प्रतिशत देने का विचार अहंकार न बन जाए?
सत्र के बाद पत्रकारों को आचार्य प्रशांत की मां से भी बातचीत का अवसर मिला. एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि हर क्षण अपनी पूरी क्षमता लगाने का आग्रह करते-करते व्यक्ति में यह विश्वास भी तो पैदा हो सकता है कि वह दूसरों से श्रेष्ठ है. क्या शत-प्रतिशत प्रयास की धारणा स्वयं अहंकार का रूप नहीं ले सकती? उन्होंने हंसकर जवाब दिया, “तो यह क्वेश्चन आपने वहां क्यों नहीं उठाया?” उन्होंने इस प्रश्न का दार्शनिक उत्तर देने के बजाय पत्रकार को आचार्य प्रशांत से ही पूछने को कहा. इस बातचीत में उस आपत्ति पर स्वयं आचार्य प्रशांत की प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी. इसके बाद जय मीणा ने उनकी मां से पूछा कि बचपन में बेटे में ऐसा क्या अलग दिखाई दिया था, जिससे उन्हें लगा हो कि वह आगे चलकर दूसरे लोगों से अलग रास्ता चुनेंगे.

उन्होंने किसी असाधारण प्रतिभा का दावा करने के बजाय कहा, “कुछ नहीं, बच्चे थे.” उनके अनुसार पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन दूसरे बच्चों की तरह डांट भी पड़ती थी. कभी परीक्षा में अंक कम आते तो वह नाराज हो जाती थीं. उन्होंने बताया कि एक बार कम अंक देखकर उन्होंने बेटे का रिपोर्ट कार्ड तक फाड़ दिया था. एक बात उन्हें विशेष रूप से याद थी. “इनको हारना पसंद नहीं था.” बचपन में बैडमिंटन खेलते समय किसी बड़े व्यक्ति से हार जाते तो कहते थे, “बड़ा होकर आपको बताऊंगा.” उनकी मां के अनुसार आचार्य प्रशांत लखनऊ के सिटी मॉन्टेसरी स्कूल में पढ़ते थे. विद्यालय की परीक्षाओं और अन्य शैक्षिक उपलब्धियों पर उन्हें कई पुरस्कार मिले. दसवीं कक्षा में अखिल भारतीय स्तर पर शीर्ष स्थान प्राप्त करने की उपलब्धि को याद करते हुए उन्होंने बताया कि स्कूल ने सम्मानस्वरूप उन्हें एक बड़े तराजू में बैठाकर फलों से तौला था.

उन्होंने बेटे की पढ़ने की आदत का भी उल्लेख किया. उनके अनुसार बचपन में ही सामान्य ज्ञान की मोटी किताबें जल्दी समाप्त कर देते थे और और किताबें मांगते थे. बड़े होने के बाद भी यह रुचि बनी रही. आईआईटी दिल्ली के दिनों की एक घटना सुनाते हुए उन्होंने बताया कि आचार्य प्रशांत अपने एक कमरे के साथी से इसलिए नाराज हुए थे क्योंकि उसने पिता का भेजा पत्र बिना पढ़े फाड़कर फेंक दिया था. वह कमरा बदलना चाहते थे, लेकिन मां ने उन्हें जल्दबाजी में फैसला न करने की सलाह दी थी.

मां चाहती थीं कि सिविल सेवा में जाएं, बेटे ने दूसरा रास्ता चुना
मां के अनुसार उनकी एक प्रमुख इच्छा थी कि बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करे. उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में सफलता प्राप्त की, लेकिन सेवा में नहीं गए. बाद में आईआईएम अहमदाबाद में पढ़ाई की. उन्होंने बताया कि आईआईएम की पढ़ाई के लिए पिता अपनी बचत से पैसे देना चाहते थे, लेकिन बेटे ने शिक्षा ऋण लेने का निर्णय किया. उनका इरादा नौकरी करके ऋण चुकाने का था. कुछ समय नौकरी करने के बाद उन्होंने वह रास्ता भी छोड़ दिया. मां के अनुसार, नौकरी छोड़ने का फैसला लेने से पहले उन्होंने अपने पिता से बात की थी. पिता ने यह कहकर निर्णय स्वीकार किया कि वह अब अपना भला-बुरा समझने के योग्य हैं.

पत्रकारों ने पूछा कि इतने बड़े संस्थानों में पढ़ने के बाद नौकरी छोड़ने से दुख नहीं हुआ. मां ने कहा कि अब दुख नौकरी छोड़ने का नहीं, बल्कि यह देखकर होता है कि बेटा लगातार काम में लगा रहता है और उसे छुट्टी तक नहीं मिलती. परिवार और निजी जीवन से जुड़े प्रश्नों पर उन्होंने बताया कि बेटे पर पारिवारिक जीवन के संबंध में दबाव नहीं डाला गया. अपनी चिंता का जिक्र करते हुए कहा कि उसके पास अब इतने लोग हैं जो उसकी देखभाल करते हैं कि उन्हें हमेशा उपस्थित रहने की जरूरत नहीं पड़ती. उन्होंने कहा, “अब वो सबके बेटा हैं. केवल एक हमारे को नहीं मिलेंगे. सबके.”

खेल की जीत और परिणाम से आजादी के बीच एक सवाल
पूरे सत्र में आचार्य प्रशांत का आग्रह था कि व्यक्ति अपने काम की गुणवत्ता को परिणाम के साथ न बांधे. वह जीतने पर इतराने और हारने से भयभीत होने, दोनों को एक ही समस्या के दो रूप मानते हैं. उनके अनुसार खिलाड़ी को अपनी पूरी क्षमता खेल में लगा देनी चाहिए, लेकिन पदक या हार को अपनी पहचान का अंतिम प्रमाण नहीं बना लेना चाहिए. दिलचस्प यह रहा कि उसी शाम जय मीणा ने एक बच्चे को खेल के बारे में सलाह देते हुए कहा, “बनना है तो नंबर वन, नेवर बी नंबर टू.”

यह कथन खेलों की उस परिचित भाषा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें सर्वोच्च स्थान हासिल करना ही प्रेरणा माना जाता है. आचार्य प्रशांत का तर्क उससे अलग था. वह उत्कृष्टता को महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन परिणाम से अपनी पहचान बांधने का विरोध करते हैं. दोनों दृष्टिकोणों में अंतर स्पष्ट है. खिलाड़ी के सामने प्रश्न होता है कि अगली प्रतियोगिता कैसे जीती जाए. आचार्य प्रशांत उससे पहले यह पूछ रहे थे कि जीतने की इच्छा उसके भीतर किस जगह से उठ रही है और हार की आशंका उसे इतना प्रभावित क्यों करती है.

जय मीणा ने स्वीकार किया कि बड़े मुकाबलों में उनके भीतर जो दबाव पैदा होता रहा, उसकी चर्चा उन्होंने पहले इतनी खुलकर नहीं की थी. सत्र में उन्होंने उस समस्या को स्वीकार किया, लेकिन यह प्रश्न अभी भी खुला है कि आगे के मुकाबलों में उनकी मनःस्थिति और प्रदर्शन पर इस समझ का क्या असर होगा.  तीन घंटे से अधिक चले संवाद का निष्कर्ष कोई नया अभ्यास कार्यक्रम या पदक जीतने का नुस्खा नहीं था. आचार्य प्रशांत ने खिलाड़ियों से आग्रह किया कि वे केवल खेल की तकनीक नहीं, खेलने वाले व्यक्ति के भय, अपेक्षाओं और पहचान को भी जांचें. उनका कहना था कि उत्कृष्टता किसी एक दिन का प्रदर्शन नहीं, जीवन जीने का ढंग है.

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dainikupeditor@gmail.com

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