UP 2027: का कहत बा यूपी? | Part 15
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की उल्टी गिनती अब सिर्फ चुनावी सुगबुगाहट नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के रणनीतिक मंथन का केंद्र बन चुकी है. राज्य की सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए हर दल जातिगत समीकरणों के चक्रव्यूह को भेदने में जुटा है, लेकिन इस बार के चुनावी रण की स्क्रिप्ट में दो ऐसे सबसे बड़े ध्रुव उभरकर सामने आए हैं, जिन पर भविष्य की सरकार का गणित टिका है- ‘मातृशक्ति’ (महिला वोटर) और ‘यूथ’ (युवा वर्ग). हाल ही में योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा लिए गए दो बड़े नीतिगत फैसले. एक जिसमें 60 साल से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए राज्य की बसों में आजीवन मुफ्त यात्रा (‘लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति योजना’) और एमबीबीएस-बीडीएस इंटर्न्स का स्टाइपेंड ₹12,000 से बढ़ाकर ₹25,000 किया गया है. चुनाव से पहले बहुत कुछ कहानी बयां कर रही है. एक तरफ आधी आबादी के एक बड़े हिस्से को आर्थिक राहत देकर सीधे उनके सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन को छुआ जा रहा है, तो दूसरी तरफ मेडिकल छात्रों के जरिए पढ़े-लिखे युवाओं और उनके परिवारों को साधने की कोशिश हो रही है. क्या यह मास्टरस्ट्रोक बीजेपी को सत्ता की हैट्रिक दिलाने में मददगार साबित होगा, या विपक्षी दलों के पीडीए (PDA) और अन्य समीकरण इस किले को ढाह देंगे?
60+ महिलाओं को जिंदगी भर बस में मुफ्त सफर
सबसे पहले बात उस फैसले की, जिसने यूपी की चुनावी राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा पैदा कर दी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में 25 अगस्त 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में ‘लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति योजना’ को मंजूरी दी गई. इसके तहत 60 साल या उससे अधिक उम्र की महिलाएं उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की सामान्य बसों में आजीवन मुफ्त यात्रा कर सकेंगी. सरकार के मुताबिक योजना का लाभ एक करोड़ से ज्यादा महिलाओं तक पहुंच सकता है. इसके लिए हर महीने करीब ₹22.5 करोड़ के खर्च का अनुमान है. यानी सरकार ने सिर्फ किसी खास वर्ग को कुछ दिनों या किसी त्योहार तक राहत नहीं दी, बल्कि ‘आजीवन’ शब्द जोड़कर इस योजना को लंबी अवधि का लाभ बना दिया है.
रक्षाबंधन से पहले क्यों हुआ ऐलान?
अब यहां से सियासी सवाल शुरू होता है. यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में रक्षाबंधन का माहौल है और 2027 का विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है. सरकार इसे बुजुर्ग महिलाओं की सुविधा, सम्मान और सुरक्षित आवागमन से जोड़ रही है. लेकिन राजनीति में टाइमिंग भी बहुत मायने रखती है. चुनाव से करीब एक साल पहले 60+ महिलाओं जैसे बड़े सामाजिक समूह को सीधे फायदा देने वाली योजना का ऐलान स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक चर्चा पैदा करेगा. यूपी में बुजुर्ग महिलाएं सिर्फ एक वोटर नहीं हैं. वह परिवार के फैसलों में प्रभाव रखने वाली सदस्य भी होती हैं. गांव-कस्बों में आने-जाने, रिश्तेदारी निभाने, धार्मिक स्थलों तक पहुंचने या इलाज के लिए शहर जाने में बस किराया कई परिवारों के लिए खर्च का हिस्सा होता है. ऐसे में मुफ्त यात्रा का फायदा सीधे महिला को दिखेगा, लेकिन उसका असर परिवार के बजट तक भी पहुंच सकता है.
एक करोड़ से ज्यादा महिलाओं तक पहुंच
योजना का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू इसका संभावित दायरा है. सरकारी अनुमान के अनुसार एक करोड़ से अधिक महिलाएं इसका लाभ उठा सकती हैं. प्रतिदिन करीब 88 हजार महिलाओं की यात्रा के आधार पर सरकार ने लगभग ₹22.5 करोड़ मासिक खर्च का अनुमान लगाया है. यानी यह कोई छोटी या सीमित योजना नहीं है. इसका संभावित लाभार्थी वर्ग पूरे प्रदेश में फैला हुआ है. यही बात इसे चुनावी नजरिए से भी महत्वपूर्ण बनाती है. बीजेपी की राजनीति में ‘लाभार्थी वर्ग’ पिछले कुछ चुनावों में अहम चर्चा का विषय रहा है. ऐसे में 60+ महिलाओं को सीधे जोड़ने वाली योजना उस लाभार्थी राजनीति का नया विस्तार बन सकती है.
‘मातृशक्ति’ नाम में भी है संदेश
योजना का नाम भी अपने आप में राजनीतिक संदेश देता है- लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति योजना. अहिल्याबाई होल्कर को प्रशासन, जनकल्याण और धार्मिक-सामाजिक कार्यों के लिए याद किया जाता है. उनके नाम के साथ ‘मातृशक्ति’ जोड़कर योजना को सिर्फ मुफ्त यात्रा तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे महिला सम्मान और सशक्तिकरण के नैरेटिव से जोड़ दिया गया है. यही बीजेपी की राजनीति का एक अहम हिस्सा रहा है. योजनाओं के साथ सिर्फ आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक संदेश भी तैयार किया जाता है. ऐसे में मुफ्त बस यात्रा + मातृशक्ति + लोकमाता अहिल्याबाई का कॉम्बिनेशन अपने आप में एक राजनीतिक नैरेटिव बनाता है.
पहले भी महिलाओं पर रहा बीजेपी का फोकस
यूपी की राजनीति में महिला वोटर का महत्व अचानक नहीं बढ़ा है. उज्ज्वला योजना से लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय, बैंक खाते और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों तक बीजेपी ने महिला लाभार्थियों को लगातार अपने राजनीतिक नैरेटिव के केंद्र में रखा है. बीजेपी के लिए इसका फायदा यह रहा है कि महिला मतदाता को सिर्फ जातीय पहचान के आधार पर देखने के बजाय लाभार्थी के तौर पर भी संबोधित किया गया. अब 60+ महिलाओं के लिए आजीवन मुफ्त बस यात्रा उसी रणनीति की अगली कड़ी के तौर पर देखी जा सकती है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर महिला सिर्फ योजना के आधार पर वोट करेगी. यूपी की महिला मतदाता भी महंगाई, सुरक्षा, रोजगार, परिवार और स्थानीय मुद्दों को देखकर फैसला करती है. लेकिन यह योजना उस तक पहुंचने वाला एक और सीधा संदेश जरूर बन सकती है.
मेडिकल इंटर्न को ₹25 हजार, युवाओं पर भी दांव
अब बात दूसरे बड़े फैसले की. योगी कैबिनेट ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों, संस्थानों और चिकित्सा विश्वविद्यालयों में MBBS और BDS की अनिवार्य रोटेटरी इंटर्नशिप कर रहे छात्रों का मासिक स्टाइपेंड ₹12 हजार से बढ़ाकर ₹25 हजार कर दिया है. यानी रकम में ₹13 हजार की सीधी बढ़ोतरी हुई है और स्टाइपेंड दोगुने से भी ज्यादा हो गया है. करीब 3,928 मेडिकल और डेंटल इंटर्न को इसका लाभ मिलने की उम्मीद है. यह फैसला सिर्फ आर्थिक राहत नहीं है. मेडिकल इंटर्न सरकारी अस्पतालों में OPD, वार्ड और इमरजेंसी जैसी सेवाओं में काम करते हैं. ऐसे में स्टाइपेंड बढ़ाने को सरकार ने उनकी भूमिका और लंबे समय से चली आ रही मांग से भी जोड़ा है. यह फैसला ऐसे समय आया है जब मेडिकल इंटर्न स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन भी कर चुके थे.
मातृशक्ति के साथ ‘मेडिकल यूथ’ भी
अब दोनों फैसलों को एक साथ रखकर देखिए. एक तरफ 60+ महिलाएं, दूसरी तरफ मेडिकल इंटर्न युवा वर्ग. यानी सरकार ने एक ही कैबिनेट बैठक में समाज के दो अलग-अलग लेकिन प्रभावशाली वर्गों को आर्थिक लाभ देने वाले फैसले किए हैं. मेडिकल इंटर्न की संख्या महिलाओं की योजना के मुकाबले बहुत कम है, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश अलग है. डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों का वर्ग सोशल मीडिया और शहरी क्षेत्रों में प्रभावशाली है. स्टाइपेंड में ₹13 हजार की बढ़ोतरी का संदेश मेडिकल समुदाय में तेजी से फैल सकता है. यानी चुनावी राजनीति में इसे ऐसे समझिए- एक फैसला बड़े महिला लाभार्थी वर्ग तक पहुंचता है, दूसरा फैसला पढ़े-लिखे युवा और मेडिकल प्रोफेशनल वर्ग को संबोधित करता है.
सिर्फ महिलाओं को नहीं, युवाओं को भी टैबलेट
इसी कैबिनेट बैठक में 25 लाख टैबलेट खरीदने के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली है. ये टैबलेट पात्र युवाओं को स्वामी विवेकानंद युवा सशक्तीकरण योजना के तहत दिए जाएंगे. इसके लिए 2026-27 के बजट में ₹2,374.60 करोड़ का प्रावधान बताया गया है. अब तस्वीर थोड़ी और साफ होती है. महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा, मेडिकल इंटर्न के लिए ज्यादा पैसा और युवाओं के लिए टैबलेट- तीनों फैसलों को अलग-अलग सरकारी योजनाओं के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन 2027 के चुनावी संदर्भ में इनका राजनीतिक अर्थ भी निकाला जाएगा.
विपक्ष कहेगा चुनावी दांव, BJP बताएगी कल्याण
अब सवाल है कि विपक्ष इसे कैसे देखेगा? जाहिर है, 2027 के चुनाव से पहले आने वाली हर बड़ी लोककल्याणकारी घोषणा पर राजनीतिक बहस होना तय है. विपक्ष इसे चुनावी लाभ के लिए उठाया गया कदम बता सकता है, जबकि बीजेपी इसे अपने शासन की योजनाओं और ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाले मॉडल के रूप में पेश करेगी. यहीं चुनावी राजनीति का असली खेल शुरू होता है. सरकार के लिए चुनौती सिर्फ योजना घोषित करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि उसका लाभ वास्तव में लोगों तक पहुंचे. दूसरी तरफ विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि वह इन योजनाओं के मुकाबले अपना वैकल्पिक नैरेटिव कितनी मजबूती से जनता के सामने रख पाता है.
क्या 2027 में चलेगा ‘मातृशक्ति कार्ड’?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या 60+ महिलाओं को आजीवन मुफ्त बस यात्रा का फैसला 2027 में बीजेपी के लिए वोट में बदल पाएगा? इसका जवाब अभी देना जल्दबाजी होगा. यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण आज भी बेहद महत्वपूर्ण हैं. सपा का PDA समीकरण, बीजेपी का गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित आधार, कांग्रेस की अपनी रणनीति और बसपा की संभावित भूमिका—इन सबका असर 2027 पर पड़ेगा. लेकिन एक बात साफ है. महिला वोटर को कोई भी पार्टी अब हल्के में नहीं ले सकती.










