नई दिल्ली. शशि वर्मा की फिल्म कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में नॉमिनेट और स्क्रीन की जा चुकी है. इसकी कहानी, निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी को काफी सराहना मिली है. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इस फिल्म को अपना समर्थन दिया है.
शशि वर्मा कि अगली डायरेक्टेड फिल्म भी सामाजिक मुद्दे पर हैं जो कि दिल्ली की पृष्ठभूमि पर आधारित एक सिचुएशनल कॉमेडी है, इसमें अली फजल, ऋचा चड्ढा और कुमुद मिश्रा जैसे बेहतरीन कलाकारों की टुकड़ी शामिल है, शशि के निर्देशन में, ये असाधारण रूप से प्रतिभाशाली कलाकार अपनी सामान्य भूमिकाओं से हटकर दर्शकों को बिल्कुल नए और कभी न देखे गए अवतारों में सरप्राइज देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
बिहार के एक छोटे शहर से आने वाले शशि वर्मा के लिए फिल्मों की दुनिया तक पहुंचना बिल्कुल भी आसान नहीं था. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कहानी कहने के अपने जुनून को कभी नहीं छोड़ा. इसी सपने को पूरा करने के लिए वह मुंबई पहुंचे और सालों तक संघर्ष करते रहे. उनका मानना है कि अगर कहानी ईमानदार हो, तो वह किसी भी बड़ी शुरुआत की मोहताज नहीं होती.
फिल्म को बनाने में लगे 12 साल
आज कई साल की मेहनत के बाद शशि इंडस्ट्री में अपनी मजबूत पहचान बना चुके हैं. उनकी नई दिल्ली बेस्ड फिल्म उनके करियर का बड़ा पड़ाव मानी जा रही है. खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में उन्हें करीब 12 साल लग गए. उनका कहना है कि यह ऐसी कहानी है, जिसे लोगों तक पहुंचाना बेहद जरूरी था.शशि के प्रोडक्शन हाउस सीनवर्क प्रोडक्शन्स की कोशिश हमेशा ऐसी फिल्में बनाने की रही है, जो सिर्फ मनोरंजन न करें बल्कि दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर करें. उनका फोकस बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से ज्यादा भावनात्मक ईमानदारी, सांस्कृतिक सच्चाई और मजबूत कहानियों पर रहता है.
दिल जीत लेगी फिल्म
आसान नहीं था मुर्गा ट्रॉफी का सफर
ग्रामीण झारखंड की ठेठ पृष्ठभूमि पर आधारित, मुर्गा ट्रॉफी सतह पर बच्चों के फुटबॉल खेलने की कहानी लग सकती है, लेकिन असल में यह बचपन, गरिमा, उम्मीद और सामाजिक बदलाव की एक बेहद भावुक कहानी है. यह फिल्म साहसपूर्वक दिखाती है कि कैसे हानिकारक पुरानी अंधविश्वास की परंपराएं, सामाजिक पूर्वाग्रह और असमानता मासूम जिंदगियों को कुचल सकती हैं. इस संवेदनशील विषय को पर्दे पर जीवंत करना एक बहुत बड़ी और कठिन चुनौती थी. किसी बड़े स्टूडियो के सपोर्ट के बिना, मुर्गा ट्रॉफी बनाने का सफर आसान नहीं था. हालांकि, शशि और लेखक उमेश उपाध्याय एवम उनके पार्टनर चंदन आनंद ने इस कहानी को मरने देने से साफ इनकार कर दिया। सार्थक सिनेमा को आवाज देने के विश्वास से प्रेरित होकर, उन्होंने क्राउडफंडिंग का कठिन रास्ता चुना.
बता दें कि इस फिल्म को बनाना आसान नहीं था. किसी बड़े स्टूडियो का साथ नहीं मिला, लेकिन शशि वर्मा, लेखक उमेश उपाध्याय और उनके पार्टनर चंदन आनंद ने हार नहीं मानी. उन्होंने क्राउडफंडिंग का रास्ता चुना. कई आम लोगों ने इस फिल्म के लिए आर्थिक मदद की, क्योंकि उन्हें इस कहानी और टीम के विजन पर भरोसा था. इसी वजह से ‘मुर्गा ट्रॉफी’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की साझी जीत बन गई, जो अच्छी और सार्थक कहानियां बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं. फिल्म की सबसे खास बात यह है कि गंभीर सामाजिक मुद्दे को बच्चों की मासूम नजर से दिखाया गया है. इससे कहानी भावुक होने के साथ-साथ दर्शकों के दिल तक आसानी से पहुंचती है.
शशि वर्मा सिर्फ निर्देशक ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन अभिनेता और लेखक भी हैं. उन्होंने ‘बाला’, ‘कठल’, ‘बवाल’, ‘मिस्टर एंड मिसेज माही’, ‘बंटी और बबली 2’, ‘थाई मसाज’, ‘मासूम सवाल’ और ‘हू एम आई’ जैसी फिल्मों में काम किया है. इसके अलावा ‘ये काली काली आंखें’, ‘चाचा विधायक हैं हमारे’ और ‘दिल बेकरार’ जैसी वेब सीरीज में भी अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया है.










