लखनऊ: उत्तर प्रदेश के लखनऊ की सबसे पॉश कमर्शियल इलाके विभूतिखंड की समिट बिल्डिंग में इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड का कॉल सेंटर चलाया जा रहा था. छापेमारी के दौरान पुलिस ने 119 आरोपियों को गिरफ्तार किया है. इनमें 92 पुरुष और 27 महिलाएं हैं. आरोपियों के पास से 103 लैपटॉप, 177 मोबाइल फोन, एक्सेसरीज और अन्य गैजेट बरामद हुए हैं. इसके अलावा, इस गिरोह के तार कई देशों से जुड़े होने की बात सामने आई है. मगर आपको पता है क्या कि ये मिनी जामताड़ा की कमर किसने तोड़ी है. यह पूरी कार्रवाई एडीसीपी क्राइम किरन यादव के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच और कई थानों की संयुक्त पुलिस दल ने की थी.
75 करोड़ की ठगी
लखनऊ की समिट बिल्डिंग में पिछले 6-7 महीनों से यह साइबर फ्रॉड का कॉल सेंटर चल रहा था. इस दौरान अमेरिकी नागरिकों से करीब 75 करोड़ रुपये की ठगी किए जाने की बात सामने आई है. इस साइबर फ्रॉड सिंडिकेट की जानकारी देने के लिए बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कॉल सेंटर के ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार को पेश किया गया. ये दोनों अहमदाबाद के रहने वाले हैं. लखनऊ के पुलिस कमिश्नर अमरेंद्र सेंगर के मुताबिक विदेशी नागरिकों, विशेषकर अमेरिकी नागरिकों, को साइबर ठगी के लिए निशाना बनाया जा रहा था.
जामताड़ा का भंडाफोड़ करने वाली कौन हैं अफसर?
इस एक्शन के बाद सोशल मीडिया पर एक नाम छा गया. हर कोई उनके बारे में जानना चाह रहा है. वो हैं- आईपीएस अफसर किरन यादव. वह 2021 बैच की अफसर हैं. उनका जन्म 3 मई 1987 को हुआ था. उन्होंने बीकॉम, ईकॉम और सीए की शिक्षा प्राप्त की है. वह मूलरूप से यूपी के सुल्तानपुर की रहने वाली हैं. उनके पिता का नाम शत्रुघ्न सिंह यादव है. उन्होंने 2020 यूपीएससी परीक्षा में शामिल होकर ऑल इंडिया 392वीं रैंक हासिल की थी. उनके पिता चंडीगढ़ में इंजीनियर हैं. किरण के भाई सूरज यादव कनाडा की कंपनी में इंजीनियर हैं. आईपीएस किरन यादव इससे पहले लखनऊ में ही एसीपी के रूप में सेवाएं दे चुकी हैं.
कैसे चल रहा था साइबर फ्रॉड का कॉल सेंटर?
साइबर ठगी का यह कॉल सेंटर कॉरपोरेट स्टाइल में बेहद संगठित तरीके से संचालित किया जा रहा था. अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने के लिए कई टीमें बनाई गई थीं और हर टीम की अलग-अलग जिम्मेदारी थी. पहली टीम लोगों से संपर्क करती थी. अमेरिकी नागरिकों को एसएमएस भेजकर बताया जाता था कि उनके Amazon, Apple या Samsung खाते का इस्तेमाल चाइल्ड पोर्नोग्राफी, ड्रग ट्रैफिकिंग और आतंकवादी गतिविधियों में हुआ है. इसके बाद उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए एक टोल-फ्री नंबर पर कॉल करने के लिए कहा जाता था. टोल-फ्री नंबर पर कॉल आने के बाद दूसरी टीम (डायलर टीम) पीड़ित से सहानुभूति के साथ बात कर उसका भरोसा जीतती थी. उसे बताया जाता था कि उसके खाते का इस्तेमाल आपराधिक और आतंकवादी गतिविधियों में हुआ है. डायलर टीम पीड़ित का वित्तीय डेटा हासिल कर लेती थी और यह जताती थी कि वह गंभीर मुसीबत में फंस गया है. इसके बाद मामला आगे की कार्रवाई के लिए बैंकर टीम को सौंप दिया जाता था.
बैंकर टीम पीड़ित की बैंक संबंधी जानकारी सत्यापित करने के बहाने उसे बताती थी कि उसके खाते का इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों में हुआ है और उसमें संदिग्ध लेनदेन पाए गए हैं. इसके बाद उसे धमकी दी जाती थी कि उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है तथा उसका सोशल सिक्योरिटी नंबर और बैंक खाते फ्रीज किए जा सकते हैं. डरे हुए अमेरिकी नागरिक को अंतिम चरण में क्लोजर टीम के पास ट्रांसफर कर दिया जाता था.
यह टीम पीड़ित को बताती थी कि वह कार्रवाई से तीन तरीके से बच सकती है.
- पीड़ित से कहा जाता था कि उसका बैंक खाता फ्रीज होने वाला है, इसलिए वह अपनी जमा रकम निकालकर उससे Amazon, Flipkart जैसी कंपनियों के गिफ्ट वाउचर खरीद ले. इसके बाद गिफ्ट वाउचर का नंबर और पिन लेकर उन्हें रिडीम कर लिया जाता था.
- दूसरे तरीके में पीड़ित को एक क्यूआर कोड भेजा जाता था और उससे क्रिप्टो वॉलेट में पैसे ट्रांसफर कराए जाते थे.
- तीसरे तरीके में अमेरिका की United States Postal Service (USPS) के माध्यम से नकदी, गहने, सोना-चांदी आदि मंगवाए जाते थे. बाद में इस रकम को हवाला के जरिए भारत भेजा जाता था.
इसी रकम से कॉल सेंटर के कर्मचारियों को वेतन दिया जाता था. प्रत्येक कर्मचारी को लगभग 30 से 40 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता था, जबकि कुछ लोगों को बोनस भी दिया जाता था. कर्मचारियों के आने-जाने की व्यवस्था भी की गई थी और उन्हें लखनऊ में ठहराया जाता था. पुलिस कमिश्नर के मुताबिक देश के लगभग हर राज्य से इस कॉल सेंटर के लिए लोगों की भर्ती की गई थी. विशेष रूप से अमेरिकन एक्सेंट में बात करने वाले और इंटरनेशनल कॉल सेंटर का अनुभव रखने वाले लोगों को नौकरी पर रखा गया था.
अब शासन, केंद्रीय गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के माध्यम से भारतीय दूतावास के जरिए अमेरिकी नागरिकों को इस साइबर ठगी के बारे में जानकारी दी जाएगी. पुलिस कमिश्नर के अनुसार इस पूरे गिरोह के पीछे किसी भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक की भूमिका हो सकती है. आरोपियों को अमेरिकी नागरिकों का डेटा चार्ल्स नामक व्यक्ति उपलब्ध कराता था. पुलिस के मुताबिक हर 10 कॉल में से लगभग 3 कॉल ठगी में बदल जाती थीं, जबकि 7 कॉल सफल नहीं हो पाती थीं.
पुलिस कमिश्नर ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों के ऊपर भी कई लोग हैं, जिन्हें जल्द ट्रेस किया जाएगा. इस मामले के लखनऊ कनेक्शन की भी गहन जांच की जा रही है. यह गिरोह पिछले करीब छह महीनों से समिट बिल्डिंग से संचालित हो रहा था और प्रतिदिन अमेरिकी नागरिकों से लगभग 35 से 40 लाख रुपये की ठगी कर रहा था.











