ग्रेटर नोएडा: सेक्टर गामा-1 स्थित रॉयल वॉकवे प्रोजेक्ट में दुकानों की पोजेशन को लेकर खरीदारों और बिल्डर के बीच विवाद सामने आया है. कई खरीदारों का आरोप है कि उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से दुकानें बुक कराईं और निर्धारित समय तक कब्जा मिलने की उम्मीद की थी, लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी उन्हें दुकानों का कब्जा नहीं मिला है.
खरीदारों का कहना है कि वे इस संबंध में प्राधिकरण, रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) और अन्य संबंधित अधिकारियों से शिकायत कर चुके हैं. वहीं, बिल्डर की ओर से कहा गया है कि जो खरीदार पैसा जमा कर दुकान का हैंडओवर लेना चाहते हैं, वे आगे की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं.
दिसंबर 2023 में मिलना था कब्जा
प्रोजेक्ट के खरीदार संदीप सिंह के कहा कि उन्होंने अप्रैल 2022 में रॉयल वॉकवे में दुकान बुक की थी. उनके अनुसार, RERA से संबंधित तय समयसीमा के मुताबिक दिसंबर 2023 में दुकान का कब्जा मिलना था, लेकिन इसके बाद भी उन्हें दुकान नहीं मिली. संदीप सिंह का कहना है कि उन्होंने प्राधिकरण और RERA में शिकायतें दर्ज कराईं. लिखित आवेदन और रिमाइंडर भी दिए गए. उनका दावा है कि RERA संवाद के माध्यम से चेयरमैन तक भी अपनी समस्या पहुंचाई गई, लेकिन उन्हें अब तक लिखित आश्वासन या ठोस कार्रवाई की जानकारी नहीं मिली है.
प्राधिकरण और बिल्डर के बीच फंसने का आरोप
खरीदारों का कहना है कि दुकानों का कब्जा और रजिस्ट्री नहीं होने के कारण वे लगातार परेशान हो रहे हैं. उनका आरोप है कि प्राधिकरण और बिल्डर एक-दूसरे की ओर जिम्मेदारी डाल रहे हैं. खरीदारों के मुताबिक, प्राधिकरण की ओर से कथित तौर पर कहा गया है कि बकाया पेनल्टी का भुगतान होने तक ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) जारी नहीं किया जाएगा. ऐसे में खरीदारों का सवाल है कि जब उन्होंने अपनी ओर से भुगतान किया है, तो उन्हें दुकान का कब्जा कब मिलेगा.
पैसा मिलने के बाद भी नहीं दिया कब्जा
संदीप सिंह का आरोप है कि बिल्डर ने खरीदारों से कहा था कि जो पहले भुगतान करेगा, उसे प्राथमिकता के आधार पर रजिस्ट्री और कब्जा दिया जाएगा. उनके मुताबिक, करीब 144 खरीदारों ने पैसे जमा किए और इसके बाद OC मिलने की बात सामने आई, लेकिन इसके बावजूद उन्हें दुकानों का कब्जा और रजिस्ट्री नहीं मिल सकी.
12 करोड़ रुपये जमा करने का दावा
खरीदार विक्रम प्रताप और रघुवीर सिंह ने भी अपनी परेशानी जाहिर की. रघुवीर सिंह के मुताबिक, बिल्डर के कहने पर 100 से अधिक खरीदारों ने पांच प्रतिशत राशि जमा कराई. उनके दावे के अनुसार, इस तरह करीब 12 करोड़ रुपये जमा किए गए थे. खरीदारों को उम्मीद थी कि भुगतान के बाद उन्हें दुकानें मिल जाएंगी, लेकिन अब तक उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ है.
खरीदारों का कहना है कि कई लोगों ने दुकान खरीदने के लिए कर्ज लिया है और वे उसकी EMI भी चुका रहे हैं. कुछ लोगों ने अतिरिक्त आय की उम्मीद में अपनी संपत्ति बेचकर दुकान खरीदने की योजना बनाई थी. उनका कहना है कि दुकान का इस्तेमाल शुरू नहीं कर पाने के कारण उन पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है. खरीदारों ने मुख्यमंत्री कार्यालय और संबंधित अधिकारियों से भी शिकायत करने की बात कही है.
बिल्डर की ओर से क्या कहा गया?
बिल्डर की ओर से मैनेजर राहुल चतुर्वेदी ने कहा कि यदि कोई खरीदार अपना पैसा वापस लेना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि अब दुकानों के रेट अच्छे हो गए हैं और खरीदारों को आकर अपना काम शुरू करना चाहिए. राहुल चतुर्वेदी के मुताबिक, बिल्डर की ओर से हैंडओवर की प्रक्रिया के लिए तीन महीने पहले ही फिट-आउट लेटर जारी किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि खरीदार अपनी बकाया राशि जमा कर दुकानों का हैंडओवर ले सकते हैं.
अब समाधान का इंतजार
फिलहाल, खरीदार दुकानों का कब्जा, रजिस्ट्री और अपनी शिकायतों पर स्पष्ट कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. दूसरी ओर, बिल्डर की ओर से भुगतान पूरा कर हैंडओवर लेने की बात कही गई है. ऐसे में पूरे मामले में प्राधिकरण की बकाया राशि, OC की स्थिति, भुगतान की शर्तों और कब्जा देने की प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता जरूरी है. अब देखना होगा कि संबंधित अधिकारी और बिल्डर खरीदारों की शिकायतों का समाधान किस तरह करते हैं और उन्हें उनकी दुकानों का कब्जा कब तक मिल पाता है.










