हर मंदिर में दिखने वाला ये विदेशी फूल, जीवन-अमरता से इसका सीक्रेट रिश्ता
Last Updated:August 25, 2026, 15:43 IST
Rainy Season Gardening : गाजीपुर की कचहरी के पास गो ग्रीन नर्सरी में नागचंपा का पौधा खूब बिक रहा है. इसके सफेद फूल और सांप के फन जैसे पत्ते इसे दूसरे पौधों से अलग बनाते हैं. यह पौधा धार्मिक अनुष्ठानों में काम आता है. लोकल 18 से गाजीपुर के हॉर्टिकल्चर एक्सपर्ट वशिष्ठ यति बताते हैं कि पौधा भारत में चंपा और फ्रैंगिपानी जैसे नामों से जाना जाता है. धार्मिक व्याख्याएं इसकी पांच पंखुड़ियों को पंचतत्व से जोड़ती हैं. प्लूमेरिया मूल रूप से भारत का पौधा नहीं है. इसे जीवन और अमरता से भी जोड़ा गया क्योंकि इसकी शाखा अलग होने के बाद भी दोबारा पत्तियां और फूल दे सकती हैं.
नागचंपा (Plumeria pudica) का यह पौधा भारत में चंपा और फ्रैंगिपानी जैसे नामों से जाना जाता है. मंदिरों के आसपास इसकी मौजूदगी और पूजा में फूलों के इस्तेमाल ने इसे केवल सजावटी पौधा नहीं बल्कि धार्मिक संस्कृति से भी जोड़ दिया है. इसकी खास पहचान चम्मच जैसी हरी पत्तियां और पीले केंद्र वाले सफेद फूल हैं. यह पौधा बागवानी में खास पसंद किया जाता है.
सफेद पंखुड़ियों के बीच दिखाई देता पीला हिस्सा इस फूल की खूबसूरती बढ़ाता है. भारतीय परंपराओं में चंपा जैसे सुगंधित फूलों को पूजा और पवित्रता से जोड़ा गया है. कुछ आधुनिक धार्मिक व्याख्याएं इसकी पांच पंखुड़ियों को पंचतत्व से जोड़ती हैं. भारत में यह प्राकृतिक रूप से देशज फूल नहीं बल्कि उगाया जाने वाला सजावटी पौधा है.
प्लूमेरिया मूल रूप से भारत का पौधा नहीं है. इसका प्राकृतिक क्षेत्र उष्णकटिबंधीय अमेरिका और कैरेबियन तक माना जाता है. भारत आने के बाद यह बगीचों और धार्मिक परिसरों का हिस्सा बन गया. आज इसकी पहचान इतनी भारतीय हो चुकी है कि बहुत से लोग इसे सदियों पुराना देशी फूल समझते हैं.
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चंपा को लेकर भारतीय धार्मिक परंपराओं में एक रोचक कथा भी मिलती है. एक पौराणिक कथा में नारद मुनि और चंपक वृक्ष का प्रसंग आता है, जिसमें फूलों को लेकर वृक्ष के झूठ बोलने की कहानी और उसके बाद श्राप का जिक्र है. हालांकि यह कथा चंपक से जुड़ी है इसलिए इसे हर प्लूमेरिया प्रजाति पर लागू करना सही नहीं होगा. नागचंपा के पौधे पर खिलने वाले प्राचीन, शुद्ध सफेद पंखुड़ियों वाले फूल और उनका बीच का हिस्सा इस पौधे को और भी आकर्षक बनाता है.
इस पौधे की पत्तियां बेहद अनोखे आकार की होती हैं, जो फिलामेंट या चम्मच जैसी और नाग के फन से मेल खाती हैं. यही कारण है कि स्थानीय बोलचाल में इसे नागचंपा के फूल के रूप में भी जाना जाता है. एक पुरानी भारतीय मान्यता में इसे जीवन और अमरता से भी जोड़ा गया क्योंकि इसकी शाखा अलग होने के बाद भी दोबारा पत्तियां और फूल दे सकती हैं.
भारत में चंपा नाम से पहचाने जाने वाले प्लूमेरिया के फूलों का इस्तेमाल कई जगह धार्मिक अर्पण में होता है. गाजीपुर के हॉर्टिकल्चर एक्सपर्ट वशिष्ठ यति बताते हैं कि वनस्पति विवरण में भी सफेद प्लूमेरिया को चंपा और मंदिर वृक्ष जैसे नामों से दर्ज किया गया है. यही वजह है कि नर्सरी में बिकता यह पौधा घर की सजावट से आगे सांस्कृतिक पहचान भी रखता है.
इसके फूल अगस्त से मार्च तक खिलते हैं. भारतीय वनस्पति रिकॉर्ड के अनुसार इसे बीज के अलावा तने की कटिंग से भी तैयार किया जा सकता है. अच्छी धूप और पानी की निकासी वाली मिट्टी इसके लिए जरूरी मानी जाती है. इसकी शाखाएं नीचे से फैलकर घना आकार बनाती हैं और सफेद फूल दूर से गुलदस्ते जैसे लगते हैं.
First Published :
August 25, 2026, 15:43 IST










