नई दिल्ली: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मे जसपाल राणा सिर्फ एक चैंपियन निशानेबाज ही नहीं थे. वह एक खेल क्रांति का चेहरा थे. भारत के विश्व में निशानेबाजी में एक ताकत के रूप में उभरने से काफी पहले किशोर राणा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने शानदार प्रदर्शन से एक पीढ़ी को प्रेरित किया और उस खेल के पहले स्टार खिलाड़ियों में से एक बन गए जो उस समय भारत में क्रिकेट के दीवाने लोगों के लिए काफी हद तक अनजान था.
निशानेबाजी में विलक्षण प्रतिभा, मैदान के बाहर बेबाक अंदाज और युवा खिलाड़ियों को पहचानने में माहिर कोच, जसपाल राणा शायद पहले ऐसे निशानेबाज थे, जिन्होंने इस खेल में भारत के मजबूत होने से पहले ही भारतीयों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था. उनका उदय भारतीय निशानेबाजी के लिए मील का पत्थर साबित हुआ.
VIDEO | Delhi: Mortal remains of renowned Indian shooting coach and former Asian Games gold medallist Jaspal Rana being taken to his residence in Dehradun.
वह तस्वीर भारतीय खेल जगत की स्मृतियों में हमेशा के लिए बनी रहेगी, जब विक्टोरिया में 1994 के राष्ट्रमंडल खेलों में शानदार प्रदर्शन के बाद किशोर राणा को उनके पिता ने कंधों पर उठा दिया था. जिस निशानेबाजी खेल से भारत लगभग अपरिचित था, उस खेल में उन्हें एक हीरो मिल गया था, उनका यह प्रदर्शन एक ऐसे खिलाड़ी का उदय था, जो एक चैंपियन और एक कोच दोनों के रूप में भारतीय निशानेबाजी के भाग्य को नई दिशा देने वाला था.
उस सफलता ने राणा परिवार की किस्मत बदल दी, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने भारत के लिए पदक दिलाने वाले खेल के रूप में निशानेबाजी की क्षमता को उजागर किया.
राणा के पिता नारायण सिंह राणा पूर्व सैनिक हैं. इन दोनों पिता पुत्र की जोड़ी ने राजनीति में हाथ आजमाया और अलग-अलग समय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों से जुड़े रहे. हालांकि उन्हें चुनाव में सफलता नहीं मिली.
महज 12 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने वाले राणा का करियर लगभग दो दशकों तक चला, जिसके दौरान उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों में कई पदक जीते. वह ओलंपियन भी थे, उन्होंने 1996 के अटलांटा ओलंपिक खेलों में भाग लिया था, लेकिन पदक नहीं जीत पाए थे.
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राजवर्धन सिंह राठौड़ (2004 एथेंस ओलंपिक में रजत पदक) और अभिनव बिंद्रा (2008 बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक) ने बाद में ओलंपिक में पदक जीते, लेकिन इसकी नींव एक तरह से राणा ने रखी थी. दोहा में 2006 के एशियाई खेलों में उन्होंने तेज बुखार और मतली आने के बावजूद तीन स्वर्ण पदक जीते.
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उनका जुझारूपन 1995 में दिल्ली में राष्ट्रमंडल निशानेबाजी चैंपियनशिप में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी थी जब उन्होंने ‘फूड प्वाइजनिंग’ से पीड़ित होने के बावजूद प्रतिस्पर्धा की. जहां राष्ट्रीय कोच सनी थॉमस इस बात को लेकर चिंतित थे कि क्या उनका स्टार निशानेबाज अभ्यास के लिए पहुंच भी पाएगा या नहीं, वहीं राणा ने बीमारी को नजरअंदाज करते हुए आधा दर्जन से ज्यादा पदक जीते और उस दृढ़ता का नमूना पेश किया जो उनके जुझारू व्यक्तित्व की पहचान बन गई.
(एजेंसी से इनपुट के साथ)











