जवाहर गेट: जानिए गाजियाबाद के इस ऐतिहासिक घंटाघर का मुगल काल से फिल्मी कनेक्शन

Ghaziabad Ghantaghar History: दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर की पहचान आज ऊंची इमारतों और चौड़े एक्सप्रेसवे से होती है, लेकिन इस आधुनिकता के बीच एक ऐसी धरोहर खड़ी है जो सदियों पुराने इतिहास को खुद में समेटे हुए है. हम बात कर रहे हैं गाजियाबाद के ऐतिहासिक ‘घंटाघर’ की, जिसे आज दुनिया ‘जवाहर गेट’ के नाम से जानती है. यह इमारत सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि पुराने गाजीउद्दीन नगर के आधुनिक महानगर बनने के सफर का जिंदा गवाह है. मुगलकालीन वैभव से लेकर ब्रिटिश शासन और आजादी की लड़ाई तक, इस घंटाघर ने हर बदलते दौर को बेहद करीब से देखा है.

1740 में हुआ था ‘शाही गेट’ का निर्माण
इतिहासकारों के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि मुगल काल में इस स्थान को ‘शाही गेट’ के नाम से जाना जाता था. इसका निर्माण करीब वर्ष 1740 में मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के वज़ीर गाजी-उद-दीन फ़िरोज़ जंग द्वितीय ने करवाया था. यही वह समय था जब गाजियाबाद की नींव रखी जा रही थी. बाद में, समय के चक्र के साथ ब्रिटिश शासन के दौरान वर्ष 1939 के आसपास यहां वर्तमान क्लॉक टॉवर यानी घंटाघर का निर्माण कराया गया. उस दौर में गाजियाबाद मेरठ जिले का एक हिस्सा हुआ करता था और धीरे-धीरे एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा था.

आजादी के बाद बना ‘जवाहर गेट’
देश को जब 1947 में आजादी मिली, तो इस ऐतिहासिक स्थल का नाम बदलकर ‘जवाहर गेट’ रख दिया गया. यह नाम देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के सम्मान में दिया गया था. वास्तुकला की दृष्टि से देखें तो घंटाघर की बनावट में ब्रिटिश और इंडो-इस्लामिक शैली का एक अद्भुत संगम दिखाई देता है. लाल ईंटों और चूने से बनी इस ऊंची मीनार की चारों दिशाओं में विशाल घड़ियां लगाई गई थीं. इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि शहर के हर कोने से लोग समय देख सकें. क्योंकि, उस दौर में लोगों के पास हाथ घड़ियां नहीं होती थीं इसलिए घंटाघर शहर की समय व्यवस्था का मुख्य केंद्र माना जाता था.

जब घंटाघर की आवाज से चलती थी शहर की धड़कन
इसकी घड़ी की आवाज इतनी बुलंद थी कि दूर-दूर तक सुनाई देती थी. चाहे वे स्थानीय व्यापारी हों, दिहाड़ी मजदूर हों या दूर-दराज से आए यात्री, हर किसी के लिए समय जानने का सबसे बड़ा और विश्वसनीय माध्यम यही घंटाघर था. ब्रिटिश काल में अक्सर ऐसे घंटाघर शहरों के मुख्य बाजार और प्रशासनिक केंद्रों के समीप बनाए जाते थे. घंटाघर के आसपास का इलाका भी अपने आप में शहर का ऐतिहासिक केंद्र रहा है. पुराने समय में यहां बस अड्डा, तहसील, जेल और कोतवाली हुआ करती थी.

घोड़े पर सवार होकर गश्त करते थे कोतवाल साहब
पुराने शहर के निवासी हाजी चमन की यादों में आज भी वह दौर ताजा है जब घंटाघर के चारों ओर काफी खाली जमीन थी और सिर्फ कुछ सरकारी इमारतें नजर आती थीं. वे बताते हैं कि आजादी के बाद यहां रिहायशी आबादी और बाजारों का विस्तार हुआ. उस समय शहर की एकमात्र कोतवाली भी यहीं थी और जब कोतवाल साहब घोड़े पर सवार होकर गश्त पर निकलते थे, तो वह नजारा पूरे शहर के लिए आकर्षण का केंद्र होता था.

बॉलीवुड फिल्मों में घंटाघर की चमक
गाजियाबाद का यह घंटाघर केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बॉलीवुड के बड़े पर्दे पर भी अपनी चमक बिखेर चुका है. वर्ष 2006 में आई शाहिद कपूर और अमृता राव की सुपरहिट फिल्म ‘विवाह’ में यहां के खूबसूरत दृश्यों को फिल्माया गया था. इसके बाद वर्ष 2013 में आई फिल्म ‘जिला गाजियाबाद’ में भी इस ऐतिहासिक स्थल को प्रमुखता से दिखाया गया. आज यह स्थान न केवल एक व्यापारिक केंद्र है, बल्कि गाजियाबाद की विरासत और पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है.

भगत सिंह की प्रतिमा भी स्थापित है
वर्तमान में घंटाघर गाजियाबाद का सबसे व्यस्त और प्रमुख व्यावसायिक इलाका है. यहां की संकरी गलियां और पुराने बाजारों की चहल-पहल आज भी उत्तर भारतीय संस्कृति की सोंधी खुशबू बिखेरती है. घंटाघर के ठीक सामने महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह की प्रतिमा स्थापित है, जो इस ऐतिहासिक स्थान को देशभक्ति के गौरवशाली इतिहास से जोड़ती है.

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dainikupeditor@gmail.com

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