ओवैसी के ‘दो मुहा बात’ का खेल क्या? अखिलेश को ‘गाली’ तो सपा से ‘ताली’ की अर्जी

Last Updated:July 01, 2026, 11:40 IST

Asaduddin Owaisi in UP elections: यूपी चुनाव 2027 में असदुद्दीन ओवैसी एक ही मंच से दो तरह की बातें करते देखे जा रहे हैं. ओवैसी अपनी रैलियों की शुरुआत में पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर जमकर बरसते दिखते हैं, फिर वह उसी मंच से उनके सामने गठबंधन में लेने की अर्जी भी लगा रहे हैं. ये ध्यान देने वाली बात है कि असदुद्दीन ओवैसी दो तरह की बातें क्यों कर रहे हैं. इससे पहले वह बिहार विधानसभा चुनाव में भी इसी तरह का काम कर चुके हैं.

यूपी चुनाव में एक तरफ ओवैसी अखिलेश यादव पर हमलावर हैं, दूसरी तरफ वह सपा से गठबंधन भी करना चाहते हैं.

लखनऊ: 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता बढ़ गई है. बिजनौर में जनसभा को संबोधित करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने बीजेपी के साथ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को निशाने पर लिया. वहीं ओवैसी ने भाषण के अगले हिस्से समाजवादी पार्टी से ये भी कहा कि अगर वह सच में बीजेपी को हराना चाहते हैं तो AIMIM को गठबंधन में शामिल करें. अब सवाल उठता है कि एक तरफ ओवैसी के निशाने पर अखिलेश यादव हैं दूसरी तरफ वह समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन भी करना चाहते हैं. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि एक ही मंच से असदुद्दीन ओवैसी दो तरह की बातें क्यों कर रहे हैं.

असदुद्दीन ओवैसी का अखिलेश यादव पर ताबड़तोड़ हमले

  1. असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव की पार्टी में समाजवाद कहीं नहीं है, वहां केवल ‘यादव वाद’ है. AIMIM चीफ ने सपा के स्थानीय नेतृत्व को भी निशाने पर लिया. उन्होंने अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर भी निशाना साधा. अपने भाषण का एक बड़ा हिस्सा यह तर्क देने में लगाया कि समाजवादी पार्टी मुसलमानों और दलितों दोनों के लिए फेल रही है.
  2. नजीबाबाद से तीन बार के सपा विधायक तस्लीम अहमद पर निशाना साधते हुए, ओवैसी ने आरोप लगाया कि पार्टी विकास करने के बजाय बीजेपी का डर दिखाकर चलती है. उन्होंने समाजवादी लीडरशिप को पूरी तरह से कमजोर बताया.
  3. अखिलेश यादव पर सीधा हमला करते हुए, AIMIM चीफ ने उन पर मुस्लिम वोटों को एक साथ लाने के लिए डर की राजनीति का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, ‘अखिलेश कहते हैं कि अगर आप मुझे वोट नहीं देंगे, तो फिर कभी चुनाव नहीं होगा.’
  4. 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र करते हुए, ओवैसी ने दावा किया कि सपा सरकार के दौरान मुसलमानों को बहुत नुकसान हुआ. अखिलेश यादव भूल जाते हैं कि जब वह मुख्यमंत्री थे, तो मुजफ्फरनगर हिंसा के दौरान 50,000 मुसलमानों को बेघर होना पड़ा था. उन्हीं गलतियों की वजह से बीजेपी सत्ता में आई.
  5. सपा के PDA नारे पर सवाल उठाते हुए, ओवैसी ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़ी खबरों का जिक्र किया और अखिलेश पर जाति के आधार पर नेताओं को चुनकर सपोर्ट करने का आरोप लगाया. ओवैसी ने कहा- ‘बीजेपी का मुख्यमंत्री मोहन यादव हो तो अखिलेश उनके साथ खड़े हो जाते हैं. क्या सिर्फ इसलिए कि वह यादव हैं? जब BJP के मुख्यमंत्री मोहन यादव आते हैं, तो अखिलेश उनके साथ खड़े रहते हैं. क्या सिर्फ इसलिए कि वह यादव हैं?’
  6. मुसलमानों से जुड़े मुद्दों की तुलना करते हुए उन्होंने कहा, ‘संभल में एक मस्जिद गिरा दी गई और नोटिस जारी किए जा रहे हैं, लेकिन अखिलेश को कोई फर्क नहीं पड़ता.’ उन्होंने आरोप लगाया, ‘यह समाजवाद नहीं है, यह केवल यादव-वाद की सियासत है.’ अखिलेश यादव पूरी तरह से सिर्फ यादव समुदाय के इर्द-गिर्द केंद्रित राजनीति करते हैं.

ओवैसी ने पहले अखिलेश को सुनाया फिर गठबंधन में लेने की दी अर्जी

असदुद्दीन ओवैसी ने अपने भाषण के पहले हिस्से में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को पहले जमकर सुनाया, फिर उन्होंने मंच से ही गठबंधन में लेने की अपील की. यूपी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्ष के संभावित गठबंधन पर, ओवैसी ने कहा कि AIMIM दूसरी पार्टियों के साथ हाथ मिलाने के लिए तैयार है, लेकिन तभी जब उनके साथ सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार किया जाए.

ओवैसी ने कहा- ‘अगर सम्मान और गरिमा पर आधारित कोई गठबंधन होता है, तो AIMIM निश्चित रूप से इसके साथ काम करने के लिए तैयार है ताकि यह पक्का हो सके कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापस न आए.’ हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि AIMIM अब अधीनस्थ भूमिका स्वीकार नहीं करेगी.

असदुद्दीन ओवैसी से क्यों परहेज करती हैं सेक्युलर पार्टियां?

  • सेक्युलरिज्म की राजनीति करने वाले तमाम राजनीतिक दल असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी AIMIM पर बीजेपी की बी टीम होने का आरोप लगाते हैं. आरजेडी, सपा, कांग्रेस, टीएमसी जैसी पार्टियां हमेशा कहती हैं कि ओवैसी उन्हीं राज्यों में चुनाव लड़ने पहुंचते हैं जहां विपक्षी पार्टियों के जीतने के चांस होते हैं. ये यूपी, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़कर अल्पसंख्यकों के वोटबैंक में सेंधमारी करते हैं, जिसका सीधा फायदा बीजेपी और एनडीए को मिलता है.
  • आरोप लगते हैं कि देश की लगभग सभी विपक्षी पार्टियों और उनके नेताओं के खिलाफ बीजेपी अपने फायदे के लिए सीबीआई, ईडी भेजकर परेशान करने और डराने का काम करती हैं, लेकिन 2014 के बाद ओवैसी या उनकी पार्टी के खिलाफ इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई है. इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर के बाद असदुद्दीन ओवैसी को जिस तरह से मोदी सरकार ने विदेश भेजा और उन्होंने भारत का पक्ष रखा उसके बाद से विपक्षी दलों को उनपर आक्रमण करने का एक और मौका मिल गया है.
  • 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटें जीती, इसके अलावा उन्होंने करीब 10 सीटों पर इतने वोट काटे जिससे महागठबंधन की सरकार नहीं बन पाई. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव और हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी की पार्टी ने कई सीटों पर सेक्युलर पार्टियों के प्रत्याशियों को भरपूर नुकसान पहुंचाया.
  • ओवैसी पर आरोप लगते रहे हैं कि हर चुनाव में वह कुछ ऐसे भावनात्मक मुद्दों को हवा देते हैं जिससे मुस्लिम वोटों का बिखराव होता है. उदाहरण के लिए आगामी यूपी चुनाव से पहले ओवैसी सपा से डिमांड कर रही है कि वह मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की बात करें. दूसरा यह की मुसलमान अब केवल सेक्युलर पार्टियों के लिए दरी नहीं बिछाएगा. ये ऐसे मुद्दे हैं जिससे खासकर युवा मुस्लिम वोटों का बिखराव देखा जाता रहा है. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद कहते हैं कि मौजूदा दौर में कोई भी सेक्युलर पार्टी किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा नहीं कर सकती है, इस बात को देश का हर मुसलमान समझता है. इसके बावजूद अगर कोई चुनावी मौसम में इस तरह बातें करता है तो इसका मतलब साफ है कि वह बीजेपी के लिए काम कर रहा है.
  • सबसे जरूरी बात यह है कि समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां सोचती हैं कि अगर उन्होंने ओवैसी गठबंधन में साझेदार बनाया तो उन्हें फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है. उनका सोचना है कि अगर वह अपने राज्यों में AIMIM को सीटें देते हैं तो ओवैसी को यहां पैर जमाने का मौका मिल जाएगा, जिससे वह मुसलमानों के बीच एक विकल्प बन सकते हैं. ऐसे में सेक्युलर पार्टियों के हाथ से बड़ा वोटबैंक खिसक सकता है. क्योंकि दूसरी तरफ बीजेपी हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए लगातार आरोप लगाती रहती है कि सपा, आरजेडी, टीएमसी जैसी पार्टियां मुस्लिमपरस्त राजनीति करती हैं. ऐसे में जब मुस्लिम वोटर ओवैसी को अपना विकल्प मान लेंगे तो इसका सीधा नुकसान सेक्युलर पार्टियों को हो सकता है.

यूपी में ओवैसी क्यों कर रहे हैं दो बातें?

दरअसल, ओवैसी यूपी, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों के मुसलमानों के बीच अपना भरोसा बढ़ाना चाहते हैं. जब कांग्रेस, सपा, आरजेडी, टीएमसी जैसी पार्टियां आरोप लगाती हैं कि ओवैसी बीजेपी का चुनावी रास्ता आसान बनाते हैं तब अल्पसंख्यकों के बीच कंफ्यूजन पैदा होता है. ओवैसी को लगता है कि इन आरोपों के चलते मुस्लिम वोटरों के बीच उनकी साख नहीं बन पा रही है. वह खुद को बीजेपी की बी टीम के दाग से अलग करना चाहते हैं. दूसरी बात यह है कि वह भली-भांति समझते हैं कि देश के मौजूदा राजनीतिक हालात में सेक्युलर पार्टियों के सहयोग के बिना वह बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बन सकते हैं. अकेले दम पर वह केवल वोटकटवा की ही भूमिका निभा सकते हैं.

शायद इसलिए एक तरफ वह अखिलेश यादव को निशाने पर भी ले रहे हैं और दूसरी तरफ वह विपक्षी गठबंधन में लेने की अर्जी भी लगा रहे हैं. इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ढोल लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के आवास पर पहुंचे थे. उन्होंने कहा था कि वह आरजेडी और कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहते हैं, ताकि बीजेपी को हराने में सहभागी बन सकें, लेकिन इसके बाद भी तेजस्वी यादव ने उन्हें भाव नहीं दिया था.

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Abhishek Kumar

अभिषेक कुमार News18 की डिजिटल टीम में बतौर एसोसिएट एड‍िटर काम कर रहे हैं. वे यहां बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तसीगढ़, उत्तराखंड की राजनीति, क्राइम समेत तमाम समसामयिक मुद्दों पर लिखते …

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Lucknow,Lucknow,Uttar Pradesh

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