50 साल से कचहरी के पेड़ तले प्यास बुझा रहा समीमुल्ला का सत्तू, जाने इसकी खासियत

Last Updated:May 09, 2026, 17:47 IST

गाजीपुर कचहरी के एक पुराने पेड़ की छांव में पिछले 50 सालों से समीमुल्ला का सत्तू लोगों की प्यास ही नहीं, दिल भी ठंडा कर रहा है. कभी वीरान रहने वाले इस इलाके में शुरू हुआ उनका छोटा सा ठेला आज वकीलों, अफसरों और दूर-दराज से आने वाले लोगों की पहली पसंद बन चुका है. घर में पिसे चने, पुदीना, नींबू और देसी मसालों से तैयार होने वाला यह सत्तू आज भी उसी पुराने अंदाज और स्वाद के साथ परोसा जाता है, जो गाजीपुर की मिट्टी और यादों की खुशबू अपने भीतर समेटे हुए है.

गाजीपुर. “दुकानदारी और मौत… कोई नहीं बता सकता कब किसके दरवाजे दस्तक दे दे!” गाजीपुर कचहरी के एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ी सत्तू की रेहड़ी पर जब समीमुल्ला ये बात कहते हैं, तो समझ आता है कि उनका सत्तू सिर्फ पेट नहीं भरता, बल्कि जीवन का दर्शन भी सिखाता है. इसी पेड़ के नीचे पिछले 50 सालों से समीमुल्ला लोगों को सत्तू पिला रहे हैं. वह बताते हैं कि जब यहां चारों तरफ वीरानी थी, तब भी उनका ठेला यहीं लगता था. आज बाजार बदल गया, दुकानें बढ़ गईं, लेकिन मिट्टी, चने और पुदीने से बनने वाला उनका सत्तू अब भी उसी स्वाद और उसी अंदाज में लोगों की प्यास बुझा रहा है.

जब सन्नाटे में गूंजी थी पहली मथनी की आवाज
आज कचहरी की ये सड़क गुलजार है, शोर है और यहां सत्तू की दर्जनों दुकानें हैं. लेकिन 50 साल पहले मंजर कुछ और था. समीमुल्ला बताते हैं, तब ये पूरा इलाका वीरान था, सिर्फ कचहरी थी और ये पुराना पेड़. हमने तब सत्तू का घोल तैयार करना शुरू किया था जब यहां सन्नाटा पसरा रहता था. वक्त बदला, सड़कें चौड़ी हुई, दुकानें बढ़ीं, लेकिन समीमुल्ला का वह पुराना ठेला और उस पेड़ की छांव आज भी अपनी जगह अडिग है.

90% वकीलों का दोपहर का लंच
गाजीपुर के 90 फीसदी वकीलों की बहस और दलीलों के पीछे समीमुल्ला का सत्तू है. कचहरी के काले कोट वाले साहब हों या विकास भवन के बड़े अधिकारी, इलाहाबाद से लेकर लखनऊ तक के रसूखदार जब गाजीपुर आते हैं, तो इस 50 साल पुराने जायके की तलब उन्हें खींच लाती है. समीमुल्ला कहते हैं, “हमारा लड़का जब सत्तू घोलता है, तो उसके हाथ खाली नहीं रहते.” इस सत्तू की खासियत इसका देसीपन है, बाजार के पिसे-पिसाए सत्तू के बजाय यहां घर पर दरे हुए चने का इस्तेमाल होता है. गर्मी बढ़ते ही उनके ठेले पर लोगों की भीड़ जुटने लगती है. समीमुल्ला बताते हैं कि उनका सत्तू आज भी पुराने तरीके से तैयार होता है. इसमें बारीक कटा प्याज, हरी मिर्च, लहसुन, पुदीना, काला नमक, सादा नमक, जीरा और नींबू का रस मिलाया जाता है. इसके बाद घर में पिसे चने के सत्तू को पानी में घोलकर उसमें ये सभी चीजें मिलाई जाती हैं.

इसे बनाने का प्रोसेस

एक बड़े बर्तन में सत्तू को मथनी से मथा जाता है और फिर गिलास में प्याज और मसालों के साथ परोसा जाता है. एक गिलास सत्तू तैयार होने में दो से तीन मिनट का समय लगता है. समीमुल्ला कहते हैं कि गर्मी में पुदीना, नींबू और सत्तू शरीर को ठंडक देने का काम करते हैं, इसलिए लोग इसे सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि राहत के लिए भी पीते हैं. सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि दूसरे जिलों से आने वाले अधिकारी भी यहां सत्तू पीने पहुंचते हैं. समीमुल्ला बताते हैं कि इलाहाबाद से आने वाले बड़े अधिकारी और विकास भवन के लोग भी उनके यहां का सत्तू पसंद करते हैं. स्थानीय नेता भी अक्सर यहां आते हैं, हालांकि वे किसी का नाम नहीं लेते. आज जब बाजार में ठंडी बोतलों और बड़े-बड़े कैफे का दौर है, तब भी समीमुल्ला का यह छोटा सा ठेला लोगों को देसी स्वाद और पुराने गाजीपुर की याद दिलाता है.

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Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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