Last Updated:May 08, 2026, 15:21 IST
Chitrakoot News: चित्रकूट में कभी डकैतों का खौफ फैला था. डकैत यहां लोगों को घर से अगवा कर लिया करते थे. बाद में फिरौती की रकम मिलने के बाद ही उन्हें छोड़ा जाता था. गांव के ही एक शख्स ने अपनी कहानी बयां की और बताया कि उनके साथ भी ऐसा हुआ था. उन्होंने कहा कि उस समय गांव के लोग शाम होते ही घरों में कैद हो जाते थे, क्योंकि डकैतों का गिरोह हर गांव तक फैले हुए थे.
चित्रकूट: बुंदेलखंड का चित्रकूट एक समय डकैतों के आतंक के लिए पूरे देश में जाना जाता था. खासकर पाठा क्षेत्र के घने जंगलों में ददुआ, ठोकिया, बबली और बलखड़िया जैसे कुख्यात डकैतों का ऐसा खौफ था कि शाम ढलते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता था. लोग जरूरी काम होने पर ही घरों से बाहर निकलते थे और शाम होते ही दरवाजे बंद कर लेते थे. डकैतों के डर का असर यहां के सामाजिक और आर्थिक जीवन पर भी साफ दिखाई देता था.
बता दें कि उस समय डकैतों का खौफ के कारण कई परिवार भय के कारण गांव छोड़कर दूसरे शहरों में बस गए, जबकि कुछ लोग मजबूरी में डकैतों के कहने पर काम करने लगे थे. उस दौर में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के मन में हमेशा डकैतों के आने का डर बना रहता था. लोगों के मन में बस एक ही उम्मीद रहती थी कि आखिर कब इनका सफाया होगा और कब हम लोग अपनी जिंदगी खुलकर जी पाएंगे.
डकैतों के संरक्षण में होता था गांव का कार्य
वहीं पाठा क्षेत्र के रहने वाले पूर्व प्रधान राजन ने लोकल 18 को जानकारी में बताया कि एक समय ऐसा था जब पूरे इलाके की पहचान केवल डकैतों के नाम से होती थी. उन्होंने बताया कि उस समय अपहरण, लूट और हत्या जैसी घटनाएं आम बात थीं. डकैतों के भय के कारण क्षेत्र का विकास पूरी तरह रुक गया था. गांवों में नाली, खड़ंजा और सड़क जैसे बुनियादी काम भी आसानी से नहीं हो पाते थे और कई बार गांव के प्रधानों और ठेकेदारों को डकैतों को फिरौती या हिस्सा देना पड़ता था, तभी विकास कार्य शुरू हो पाते थे.
17 सितंबर को प्रधान के साथ घटी थी घटना
उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि 17 सितंबर 1997 को जब वह प्रधान थे, तब डकैतों ने उन्हें घर से अगवा कर लिया था. बाद में फिरौती की रकम मिलने के बाद ही उन्हें छोड़ा गया. उन्होंने बताया कि उस समय गांव के लोग शाम होते ही घरों में कैद हो जाते थे, क्योंकि डकैतों के गिरोह हर गांव तक फैले हुए थे. जो लोग उनकी बात नहीं मानते थे, उनके साथ मारपीट, लूटपाट और हत्या जैसी घटनाएं कर दी जाती थीं और उनकी बात न मानने पर कोई भी विकाश कार्य पाठा क्षेत्र में नहीं हो पाता था.
महिलाओं के लिए काफी खतरनाक था दौर
वहीं पाठा क्षेत्र की रहने वाली आदिवासी महिला बूटी ने लोकल 18 को जानकारी में बताया कि डकैतों का दौर महिलाओं के लिए बेहद भयावह था. उन्होंने कहा कि जंगल जाने वाली महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसी घटनाएं भी सामने आती थीं, डर के कारण कई परिवार अपनी बेटियों को रिश्तेदारों के यहां भेज देते थे या फिर घर से बाहर निकलने तक नहीं देते थे. हालांकि अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. डकैतों के खात्मे के बाद पाठा क्षेत्र में शांति का माहौल है और लोग खुलकर जीवन जी रहे हैं. महिलाएं और बच्चे बिना किसी डर के गांवों और जंगलों में आ-जा रहे हैं.
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आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.
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Location :
Chitrakoot,Uttar Pradesh









