‘पानी में हुनर नहीं, सुरक्षा काम आती है’, नाविक ने बताया… क्यों हो रहे हादसे

Last Updated:May 08, 2026, 14:41 IST

Ghazipur News: मध्य प्रदेश के जबलपुर में हुए बोट हादसे के बाद अब गाजीपुर की गंगा में चल रही नावों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. नवापुरा घाट के नाविक भूपेंद्र निषाद बताते हैं कि उनकी मोटरबोट पर 8 लाइफ जैकेट मौजूद हैं और हर यात्री को पहनने के लिए कहा जाता है. वे प्रशासन से नावों के पंजीकरण की भी मांग कर रहे हैं.

गाजीपुर: गंगा की लहरों पर चलती नावें गाजीपुर की पहचान हैं. हर दिन सैकड़ों लोग इन नावों के सहारे घाट से घाट तक सफर करते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के जबलपुर में क्षमता से अधिक सवारियों के चलते हुए नाव हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया है. इस हादसे के बाद तटवर्ती इलाके जैसे गाजीपुर के गंगा घाटों तक इसकी गूंज सुनाई दे रही है. हर दिन सैकड़ों लोग आस्था और पर्यटन के लिए मां गंगा की गोद में सफर करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सफर सुरक्षित है? इसी हकीकत को परखने के लिए लोकल 18 की टीम नवापुरा घाट पहुंची, जहां हमारी मुलाकात भूपेंद्र निषाद से हुई, जो जलपरी नाम की मोटरबोट चलाते हैं.

भूपेंद्र निषाद की बातों में एक मल्लाह का तजुर्बा और सुरक्षा की फिक्र साफ झलकती है. वे बताते हैं कि मेरी बोट पर 8 लोगों की क्षमता है और मेरे पास 8 ही लाइफ जैकेट हैं. अक्सर लोग कहते हैं कि हमें तैरना आता है, क्या जरूरत है? लेकिन हम अड़ जाते हैं, क्योंकि पानी में हुनर नहीं, सुरक्षा काम आती है. भूपेंद्र के मुताबिक, लाइफ जैकेट किसी भी हादसे में सबसे बड़ा सहारा होती है.

लोगों को बचाने का भी करते हैं काम
उनका कहना है कि एक जैकेट 80 से 90 किलो वजन तक के व्यक्ति को डूबने नहीं देती. अगर कोई पानी में गिर भी जाए तो 10 से 12 घंटे तक वह ऊपर तैर सकता है. वे यह भी बताते हैं कि अगर कभी नाव पर ज्यादा वजन हो जाए, तो सुरक्षा के लिए उनके पास दो अतिरिक्त ट्यूब भी रहती हैं. सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक गंगा में मोटरबोट चलाने वाले भूपेंद्र कहते हैं कि लाइफ जैकेट पहनने के बाद अगर कोई गिर भी जाए, तो उसे बचाने की क्षमता वे रखते हैं, क्योंकि वे खुद भी मल्लाह परिवार से आते हैं.

डीजल इंजन, ट्यूब और सुरक्षा का घेरा
15 से 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली अपनी डीजल मोटरबोट में भूपेंद्र ने अतिरिक्त सुरक्षा के लिए ट्यूब भी रखे हुए हैं. वे कहते हैं कि हम निषाद हैं, पानी से हमारा पुश्तैनी रिश्ता है, लेकिन तकनीक और सुरक्षा के बिना यह रिश्ता जोखिम भरा हो सकता है. भूपेंद्र की सबसे बड़ी मांग प्रशासन से है. वे चाहते हैं कि उनकी और उनके जैसे अन्य नाविकों की नावों का सरकारी पंजीकरण हो. उनका मानना है कि अगर प्रशासन नियमों को सख्त करे और नावों को रजिस्टर्ड करे, तो अवैध और असुरक्षित नावों पर लगाम लगेगी और जबलपुर जैसे हादसों को गाजीपुर की मिट्टी पर होने से रोका जा सकेगा.

जबलपुर हादसे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गंगा में चलने वाली सभी नावों पर पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम मौजूद हैं? क्या हर नाविक के पास लाइफ जैकेट और बचाव के साधन हैं और सबसे बड़ा सवाल कि क्या प्रशासन इन नावों की नियमित जांच करता है?

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आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.

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