टमाटर के पीछे पड़ा लीफ कर्ल वायरस? फल रह जाएंगे छोटे, तुरंत करें ये काम
Last Updated:May 09, 2026, 17:32 IST
Tomato Farming : टमाटर की खेती करने वाले किसान इन दिनों ‘लीफ कर्ल वायरस’ की समस्या से परेशान हैं. सफेद मक्खी से फैलने वाला यह रोग न केवल पौधों की ग्रोथ को रोकता है, बल्कि पूरी फसल को बर्बाद करने की क्षमता रखता है. समय रहते इसके लक्षणों की पहचान और नियंत्रण बेहद जरूरी है. शाहजहांपुर के उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत पाठक लोकल 18 से बताते हैं कि लीफ कर्ल वायरस का सबसे पहला लक्षण पत्तियों का ऊपर या नीचे की ओर मुड़ना और सिकुड़ना है. पूरा पौधा झाड़ीनुमा दिखने लगता है. पौधे का विकास पूरी तरह रुक जाता है.
यह वायरस टमाटर की पैदावार को 30% से लेकर 100% तक कम कर सकता है. संक्रमित पौधों में फूल बहुत कम आते हैं और अगर फल लग भी जाएं, तो वो आकार में बहुत छोटे, सख्त और बेस्वाद होते हैं. बाजार में ऐसे फलों की कोई कीमत नहीं मिलती है. गंभीर संक्रमण की स्थिति में किसान को पूरी फसल उखाड़ने तक की नौबत आ सकती है, जिससे भारी घाटा होता है.
शाहजहांपुर के जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक लोकल 18 से बताते हैं कि लीफ कर्ल वायरस का सबसे पहला लक्षण पत्तियों का ऊपर या नीचे की ओर मुड़ना और सिकुड़ना है. प्रभावित पौधे की पत्तियां आकार में छोटी रह जाती हैं और खुरदरी या मोटी महसूस होने लगती हैं. अक्सर पत्तियों की शिराएं पीली पड़ जाती हैं और पूरा पौधा झाड़ीनुमा दिखने लगता है. अगर संक्रमण शुरुआती अवस्था में हो, तो पौधे का विकास पूरी तरह रुक जाता है.
टमाटर में यह रोग ‘बेमिसिया टैबेकी’ यानी सफेद मक्खी के माध्यम से फैलता है. यह मक्खी संक्रमित पौधे का रस चूसकर स्वस्थ पौधों तक वायरस पहुंचाती है. गर्म और शुष्क मौसम इस मक्खी के प्रजनन के लिए सबसे अनुकूल होता है, जिससे संक्रमण की दर तेजी से बढ़ती है. खेत के आसपास खरपतवारों की मौजूदगी भी इस वायरस को आश्रय प्रदान करती है.
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इस रोग से बचने का सबसे आसान और किफायती तरीका ‘प्रतिरोधी किस्मों’ का चुनाव करना है. बीज खरीदते समय यह सुनिश्चित करें कि वे लीफ कर्ल वायरस के प्रति सहनशील हों. कई सरकारी और निजी बीज कंपनियां ऐसी हाइब्रिड किस्में उपलब्ध कराती हैं जिनमें संक्रमण का खतरा कम होता है. नर्सरी में पौधों को नेट हाउस या सूक्ष्म जाली के अंदर उगाना भी शुरुआती सुरक्षा सुनिश्चित करता है.
फसल चक्र अपनाकर भी इस बीमारी से बचा जा सकता है. टमाटर के बाद ऐसी फसलें लगाएं जो इस वायरस की मेजबान हों. खेत की मेड़ों पर मक्का या बाजरा जैसी ऊंची फसलें ‘बैरियर क्रॉप’ के रूप में लगाएं, जो मक्खियों के प्रवेश को रोक सकती हों. खेत को खरपतवार मुक्त रखें क्योंकि कई जंगली घासें इस वायरस और मक्खियों के लिए सुरक्षित घर का काम करती हैं.
अगर संक्रमण अधिक हो, तो रसायनों का संतुलित प्रयोग जरूरी है. सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) या थियामेथोक्सम (Thiamethoxam) का छिड़काव लाभकारी होता है. ध्यान रहे कि रसायनों का अधिक प्रयोग न करें और फूल आने की अवस्था में कीटनाशकों के चुनाव में सावधानी बरतें. कीटनाशकों का अदल-बदल कर प्रयोग करना चाहिए ताकि कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो सके.
जैविक नियंत्रण के लिए खेत में ‘येलो स्टिकी ट्रैप’ का प्रयोग करें, जो सफेद मक्खियों को आकर्षित कर नष्ट करते हैं. नीम के तेल का नियमित छिड़काव मक्खियों के अंडों और लार्वा को खत्म करने में मदद करता है. गौमूत्र और दशपर्णी अर्क का उपयोग पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कीटों को दूर रखने में कारगर साबित होता है.
टमाटर को बचाने के लिए केवल एक विधि पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत प्रबंधन (IPM) अपनाएं. इसमें बीजोपचार से लेकर, नेट, जैविक खाद और अंतिम विकल्प के रूप में रसायनों का प्रयोग शामिल है. समय-समय पर खेत का निरीक्षण करें और संक्रमित पौधों को देखते ही उन्हें उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें या जला दें ताकि संक्रमण अन्य स्वस्थ पौधों तक न फैल सके.











