नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट में जब भी किसी बड़े टूर्नामेंट की बात होती है, तो सबकी निगाहें कप्तानी और सलामी बल्लेबाजी के संतुलन पर टिकी होती है. 2027 वनडे वर्ल्ड कप को लेकर बीसीसीआई के सचिव देवजीत सैकिया का हालिया बयान कि रोहित शर्मा फिलहाल शानदार क्रिकेट खेल रहे हैं और टीम के लिए अहम हैं, कागज पर एक सामान्य तारीफ जैसा दिखता है. लेकिन अगर भारतीय क्रिकेट के अंदरूनी हालात और पिछले कुछ सालों के घटनाक्रम को गहराई से समझें, तो यह बयान सिर्फ फॉर्म की तारीफ नहीं है. यह उस प्रशासनिक और रणनीतिक मजबूरी की स्वीकारोक्ति है, जिसे भारतीय टीम मैनेजमेंट इतने वर्षों में हल नहीं कर पाया है. सच्चाई यह है कि 2027 वनडे वर्ल्ड कप में रोहित शर्मा की मौजूदगी भारत की पसंद से ज्यादा एक मजबूरी बन चुकी है. और इस मजबूरी का सबसे बड़ा कारण यह है कि पिछले आधा दशक में भारतीय क्रिकेट बोर्ड और चयनकर्ता रोहित शर्मा का एक अदद स्थायी विकल्प तैयार करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं.
पिछले चार-पांच वर्षों में भारतीय टीम मैनेजमेंट ने ओपनर्स की जगह पर प्रयोगों की झड़ी लगा दी. शिखर धवन के बाद उम्मीद थी कि कोई युवा खिलाड़ी उस जगह को पक्का करेगा, लेकिन वहां से ऐसा शून्य पैदा हुआ जिसे भरना नामुमकिन सा हो गया. इसके बाद केएल राहुल को कई मौकों पर बतौर ओपनर आजमाया गया. तकनीक के मामले में राहुल बेहद मजबूत हैं, लेकिन बड़े टूर्नामेंट्स में आक्रामक शुरुआत देने या दबाव के क्षणों में पारी संभालने की बात आई, तो उनकी फॉर्म में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया और बाद में उन्हें मध्यक्रम में शिफ्ट करना पड़ा. ईशान किशन ने वनडे में दोहरा शतक लगाकर सबको चौंकाया जरूर, लेकिन वे इस प्रदर्शन को निरंतरता में तब्दील नहीं कर सके. शॉट सिलेक्शन में जल्दबाजी और अनुशासित गेंदबाजी के सामने जूझने की उनकी कमजोरी के कारण वे टीम में अपनी जगह स्थायी नहीं कर पाए.
युवा विकल्पों की नाकामी और टीम की पुरानी निर्भरता
घरेलू स्तर और आईपीएल में रनों का पहाड़ खड़े करने वाले ऋतुराज गायकवाड़ जब भी नीली जर्सी पहनकर वनडे मैदान में उतरे, दबाव वाले मुकाबलों में वैसी छाप नहीं छोड़ पाए. दूसरी तरफ यशस्वी जायसवाल का बल्ला टेस्ट और टी-20 में तो जमकर बोला, पर 50 ओवर के खेल में पारी की रफ्तार तय करने और लंबी बल्लेबाजी करने का उनका हुनर अभी पूरी तरह तराशा जाना बाकी है. शुभमन गिल ने जरूर इस फॉर्मेट में खुद को साबित किया है, लेकिन वे दूसरे छोर पर रोहित जैसे अनुभवी महारथी के रहते ही निखरकर सामने आते हैं. जब भी रोहित को आराम दिया गया या वे चोटिल होकर बाहर रहे, नए चेहरों को मौके मिले, लेकिन कोई भी खिलाड़ी भारतीय ओपनिंग की इस सबसे अहम कड़ी को मजबूती से नहीं थाम सका.
रोहित का बेजोड़ ‘इम्पैक्ट गेम’ और आक्रामक दृष्टिकोण
रोहित शर्मा (Rohit Sharma) सिर्फ ओपनर भर नहीं हैं, वह पावरप्ले में ही मैच का रुख विरोधी टीम से छीन लेने का माद्दा रखते हैं. 2023 के वनडे विश्व कप में भारतीय फैंस ने देखा कि कैसे उन्होंने अपनी बल्लेबाजी शैली को पूरी तरह बदल डाला. उन्होंने व्यक्तिगत रिकॉर्ड्स और शतकों का लालच छोड़कर पहली ही गेंद से गेंदबाजों पर धावा बोला, जिससे आने वाले मध्यक्रम के लिए राह बिल्कुल आसान हो गई. पावरप्ले के भीतर 140 से ज्यादा के स्ट्राइक रेट से ताबड़तोड़ रन बनाना और साथ ही अपनी विकेट सुरक्षित रखना यह ऐसा हुनर है जो आज के किसी भी नए ओपनर के पास एक साथ नहीं दिखता. युवा या तो बहुत ज्यादा रक्षात्मक होकर दबाव बढ़ा लेते हैं या फिर गैर-जिम्मेदाराना शॉट खेलकर पवेलियन लौट जाते हैं. रोहित का यही निडर अंदाज़ उन्हें अपरिहार्य बना देता है.
2027 वर्ल्ड कप की चुनौतियां और कप्तानी का अनुभव
2027 में दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और नामीबिया की पिचों पर होने वाला विश्व कप किसी भी टीम के लिए कड़ा इम्तिहान होगा. वहां की तेज और उछालभरी पिचों पर खेलने के लिए सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि सालों का अनुभव काम आता है. रोहित के पास न केवल दुनिया के हर मैदान पर रन बनाने का तजुर्बा है, बल्कि मुश्किल हालात में पूरी टीम का मनोबल बनाए रखने का नेतृत्व कौशल भी है. इस वक्त भारत के पास ऐसा कोई नया कप्तान तैयार नहीं दिख रहा जो इतने बड़े वैश्विक मंच पर भारतीय फैंस की उम्मीदों का भारी वजन उठा सके. हार्दिक पांड्या की फिटनेस का अनिश्चित माहौल और शुभमन गिल की कप्तानी के शुरुआती दौर को देखते हुए, सेलेक्टर्स 2027 में किसी नए चेहरे पर इतना बड़ा दांव खेलने का जोखिम नहीं उठा सकते.
भारतीय क्रिकेट प्रबंधन का आत्ममंथन और निष्कर्ष
बीसीसीआई और चयनकर्ताओं के लिए यह वक्त गंभीर आत्ममंथन का है. देवजीत सैकिया का बयान भले ही रोहित की फॉर्म की आड़ में दिया गया हो, लेकिन सच्चाई यही है कि ‘हिटमैन’ का सही विकल्प तैयार करने में हमारा क्रिकेट सिस्टम पूरी तरह असफल रहा है. जब तक जायसवाल, गायकवाड़ या इशान किशन जैसे युवा खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार मैच जिताने की जिम्मेदारी लेना नहीं सीखते, तब तक 2027 के महाकुंभ में भारत को रोहित शर्मा पर ही भरोसा जताना होगा. रोहित को टीम में रखना बीसीसीआई की मजबूरी जरूर बन चुका है, लेकिन गनीमत यह है कि यह मजबूरी आज भी विश्व क्रिकेट के सबसे खतरनाक बल्लेबाजों में शुमार है.










