ब्रिटिश दौर में भी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र था अमेठी का यह मंदिर, जानें इतिहास और महत्व

Last Updated:July 02, 2026, 16:23 IST

Durgan Dham Amethi: अमेठी राज परिवार के राजा लाल माधव सिंह द्वारा करीब 200 साल पहले स्थापित ‘दुर्गन भवानी धाम’ ब्रिटिश हुकूमत के दौर में भी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र था. वर्ष 1903 के सरकारी गजेटियर में अंग्रेज अधिकारी एच. आर. नेविल ने दर्ज किया था कि उस दौर में सीमित संसाधनों के बावजूद यहां चैत्र और क्वार की अष्टमी पर लगने वाले मेले में करीब 50 हजार श्रद्धालु जुटते थे. यह सबसे बड़ा धार्मिक मेला था, जहां नौ देवियों के दर्शन और अमृत कुंड में स्नान के लिए लोग आते थे, जो आज भी लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.

अमेठी: यूपी में कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें, कहानियां और मंदिर मौजूद हैं, जो ब्रिटिश हुकूमत के दौर में भी उतने ही जीवंत थे जितने आज हैं. उनकी कहानियां हमें पुराने समय की याद दिलाती हैं. कुछ ऐसी ही गौरवशाली कहानी है अमेठी जिले के राज परिवार द्वारा स्थापित एक प्राचीन मंदिर की, जो आज से 123 साल पहले भी लाखों लोगों की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र हुआ करता था.

इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना अमेठी राज परिवार के राजा लाल माधव सिंह ने आज से करीब 200 साल पहले कराई थी. मंदिर में नौ पिंडियां नवदुर्गा के रूप में विराजमान हैं और परिसर में एक पवित्र ‘अमृत कुंड’ भी बना है, जहां लोग स्नान और पूजा-पाठ करने आते हैं.

1903 के गजेटियर में दर्ज है इतिहास
कल्पना कीजिए कि साल 1903 में जब न रेलगाड़ियों का कोई बड़ा जाल था, न बसें चलती थीं और न ही मोबाइल या सोशल मीडिया था, तब भी चैत्र और क्वार के महीने की अष्टमी आते ही सैकड़ों गांवों के लोग पैदल, बैलगाड़ियों और घोड़ों पर सवार होकर राघीपुर के ‘दुर्गन धाम’ पहुंच जाते थे. ब्रिटिश अधिकारी एच. आर. नेविल ने उस समय के गजेटियर में साफ लिखा है कि राघीपुर के दुर्गन धाम मेले में लगभग 50 हजार लोग इकट्ठा होते थे. उस दौर के ग्रामीण परिवेश को देखते हुए यह संख्या बहुत बड़ी थी, यही वजह है कि इसे तत्कालीन सुल्तानपुर जनपद का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता था.

अमेठी के अन्य मंदिरों का भी है रोचक इतिहास
वरिष्ठ इतिहासकार चिंतामणि मिश्र बताते हैं कि ब्रिटिश काल में सिर्फ राघीपुर ही नहीं, बल्कि जिले के कई अन्य मंदिरों में भी भारी भीड़ जुटती थी और उनका अपना एक सांस्कृतिक महत्व था.
समसेरियन माता के दुर्गन धाम में भी इन्हीं खास तिथियों पर लगने वाले मेले में करीब 20 हजार श्रद्धालु पहुंचते थे, जबकि कनु कालिकन का मेला इतना लोकप्रिय था कि वहां हर सोमवार को लगभग 5 हजार लोगों की भीड़ जुटती थी. इसी तरह मुसाफिरखाना के कोटवा में कार्तिक पूर्णिमा और चैत्र नवमी पर आयोजित ‘सेत वराह’ मेले में लगभग 25 हजार लोग आते थे. मठ सुरत गिरी के ‘नंद महर’ मेले में 20 हजार और पिंडारा करनाई के शिवरात्रि मेले में करीब 10 हजार लोग जुटते थे. लेकिन इन सबमें राघीपुर का दुर्गन धाम आस्था, जनसमूह और सांस्कृतिक प्रभाव के मामले में सबसे बड़ा और खास था.

ग्रामीण समाज के सबसे बड़े मंच थे ये मेले
इतिहासकारों के अनुसार, पुराने दौर में ये मेले केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं थे, बल्कि ये ग्रामीण समाज के सबसे बड़े सामाजिक मंच हुआ करते थे. यहां दूर-दराज से आए लोग एक-दूसरे से मिलते थे, व्यापार होता था, पारिवारिक रिश्ते तय होते थे, लोकगीत गूंजते थे और कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते थे. एक तरह से ये मेले उस दौर के सामाजिक विश्वविद्यालय की तरह काम करते थे.
आज भले ही समय बदल गया है और सुविधाएं बढ़ गई हैं, लेकिन गजेटियर के पन्नों में दर्ज यह इतिहास बताता है कि इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं कितनी समृद्ध रही हैं. अवध की लोक आस्था का प्रतीक यह मंदिर आज भी उतना ही जाग्रत है और नवरात्रि के समय यहां आज भी लाखों भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.

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Seema Nath

सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें

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