Last Updated:March 11, 2026, 13:31 IST
देशभर में लोग होली के त्यौहार का इंतजार करते हैं लेकिन कानपुर के लोग होली से ज्यादा गंगा मेला का इंतजार करते हैं उनके लिए गंगा मेला न सिर्फ एक होली का त्यौहार जैसा है बल्कि कानपुर की क्रांति का एक अद्भुत मिसाल है एक अद्भुत परंपरा है जो 84 सालों से चलती चली आ रही है
कानपुर का ऐतिहासिक गंगा मेला शहर की पहचान और परंपरा का सबसे बड़ा रंग उत्सव माना जाता है. यहां होली के दिन से भी ज्यादा होली खेली जाती है और यह उत्सव कानपुरियों के लिए बेहद खास होता है. इस दिन सुबह से ही पुराने शहर के बाजारों और गलियों में रंग-गुलाल उड़ने लगता है. हटिया, नया गंज चौक, बिरहाना रोड और सराफा जैसे इलाकों में ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकलते हैं. लाखों लोग सड़कों पर उतरकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और होली का असली रंग इसी दिन शहर की सड़कों पर दिखाई देता है.
आपको बता दें इस गंगा मेला की शुरुआत आजादी की लड़ाई के दौर से जुड़ी मानी जाती है वर्ष 1942 में अंग्रेजी शासन के दौरान होली के जस्ट लुक को लेकर शहर में तनाव पैदा हो गया था. अंग्रेजी अफसर ने होली खेलने से मना कर दिया था जिसके बाद कुछ क्रांतिकारियों ने सबसे पहले होली में झंडा फहराया और फिर वह होली खेलने लगे इसके बाद उन्हें जेल में भेज दिया गया, जिसके बाद लगातार कानपुर वाले तब तक होली खेलते रहे जब तक क्रांतिकारियों को रिहा नहीं किया गया और जब उनको रिहा किया गया, तो कानपुर ने जमकर होली का पर्व मनाया गया. तब से अनुराधा नक्षत्र वाले दिन कानपुर में गंगा मेले का आयोजन होता है.
गंगा मेले का मुख्य आकर्षक रंगों का जुलूस होता है, जो सुबह हटिया बाजार स्थित रज्जन बाबू पार्क से निकलता है. इस जुलूस में शहर के व्यापारी सामाजिक संगठन और बड़ी संख्या में आम लोग शामिल होते हैं. लोग रंगों से भरे थे. बैंड बाजों और ढोल के साथ पूरे रास्ते नाचते गाते चलते हैं. जुलूस हटिया से निकलकर नया गंज चौक कराची खाना भी रहना रोड और कई प्रमुख बाजारों से गुजरता है. दुकानदार रास्ते में खड़े होकर लोगों पर गुलाल उड़ाते हैं और लोग रंग डालते हैं इस में सबसे खास होता है इसमें उठे में घोड़े में ट्रैक्टरों में भैंस गाड़ी में लोग सवार होकर निकलते हैं.
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पिछले 84 वर्षों से कानपुरवासी इस पर्व को बेहद धूमधाम से मनाते आ रहे हैं. सबसे पहले रज्जन बाबू पार्क में जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी, जनप्रतिनिधि और शहरवासी झंडारोहण करते हैं. इसके बाद यहां से रंगों से भरे ठेले और झांकियां निकलती हैं, जो पूरे शहर में घूमती हैं. गंगा मेले की सबसे खास पहचान भैंसा गाड़ी की परंपरा रही है. पुराने समय में रंगों से भरी भैंसा गाड़ी निकलती थी, जिससे लोगों पर रंग और पानी डाला जाता था. इस गाड़ी को देखने के लिए बच्चे और बुजुर्ग खास तौर पर सड़कों पर इंतजार करते थे.
हालांकि, इस बार गंगा मेले में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला. करीब 84 साल की परंपरा में पहली बार भैंसा गाड़ी जुलूस का हिस्सा नहीं बनी. आयोजन समिति के अनुसार उन्होंने कई जगह प्रयास किया, लेकिन भैंसा गाड़ी उपलब्ध नहीं हो सकी. इसी वजह से इस बार इस परंपरा को रोकना पड़ा. हालांकि, इसके बावजूद जुलूस में ऊंट, घोड़े, ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य झांकियां शामिल रहीं. लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी और लाखों लोग रंगों में सराबोर होकर जुलूस में शामिल हुए.
दिनभर रंगों की मस्ती के बाद गंगा मेले का सबसे खास दृश्य शाम और रात में सरसैया घाट पर दिखाई देता है. यहां गंगा किनारे एक विशाल मिलन समारोह आयोजित होता है. जैसे-जैसे शाम ढलती है, शहरवासी घाट की ओर पहुंचने लगते हैं. व्यापारी, सामाजिक संगठन, प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी यहां एकत्र होते हैं. सभी एक-दूसरे को रंग लगाकर गले मिलते हैं और होली की शुभकामनाएं देते हैं. गंगा किनारे का पूरा इलाका रंग, रोशनी और उत्साह से जगमगा उठता है.
सरसैया घाट पर होने वाला यह मिलन समारोह कानपुर की सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है. यह शहर का ऐसा उत्सव है, जिसमें पूरा कानपुर खुद से शामिल होता है. ढोलक और होली के पारंपरिक गीतों की धुन पर लोग झूमते नजर आते हैं. होली के दिन से भी ज्यादा लोग इस गंगा मेले का इंतजार करते हैं. हालांकि इस बार कुछ परंपराएं बदली हुई नजर आईं, लेकिन लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी. यही वजह है कि कानपुर का गंगा मेला आज भी उतनी ही जीवंतता और खास पहचान बनाए हुए है.
First Published :
March 11, 2026, 13:29 IST










