Tarkulha Devi Mandir History: चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ 19 मार्च से होने जा रहा है. इस समय में मां दुर्गा के मंदिरों में विशेश पूजा अर्चना की जाती है. उत्तर प्रदेश की धरती पर पूर्वांचल की मां विंध्यवासिनी से लेकर पश्चिम में विराजित मां शाकंभरी देवी भक्तों की रक्षा करने के लिए विराजमान हैं. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर हर मंदिर में भक्तों का तांता लगता है. गोरखपुर के पास तरकुलहा देवी मंदिर है, जहां बंधू सिंह से जुड़ी चमत्कार की कहानी उस क्षेत्र में प्रसिद्ध है. अंग्रेजों ने बंधू सिंह को 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हुए. आइए जानते हैं तरकुलहा देवी मंदिर और उसके चमत्कार से जुड़ी कथा के बारे में.
मां दुर्गा का अवतार हैं मां तरकुलहा देवी
हम बात कर रहे हैं मां तरकुलहा देवी की, जिनको मां दुर्गा का उग्र अवतार माना जाता है. मां तरकुलहा देवी का मंदिर गोरखपुर से 20 किलोमीटर की दूरी पर तथा चौरी-चौरा से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित है, जहां दर्शन करने के लिए सिर्फ देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि नेपाल से भी भक्त मान्यता लेकर आते हैं.
भक्त के प्राणों की रक्षा करती हैं मां तरकुलहा
माना जाता है कि मां के चरणों में पूर्ण समर्थन देने वाले भक्त के प्राणों की रक्षा खुद मां तरकुलहा करती है और इसके पीछे का कारण मंदिर का इतिहास है.
मां तरकुलहा का चमत्कार, बंधू सिंह को फांसी विफल
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह जंगलों में पेड़ के नीचे पिंडियों की पूजा करते थे और उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते थे. वह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, और जब भी ब्रिटिश राज में अंग्रेज जंगल और उनकी रियासत में घुसने की कोशिश करते, तो वो उसका गला काटकर मां की पिंडियों को अर्पित कर देते.
उन्होंने कई अंग्रेजों के गले काटकर मां को समर्पित किए थे, लेकिन एक दिन अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया है और 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की, लेकिन वे विफल रहे.
मां तरकुलहा ने दी मुक्ति
माना जाता है कि उस वक्त खुद बाबू बंधू सिंह ने मां से प्रार्थना की थी कि अब उन्हें मुक्त करें. कहा जाता है कि तब मां ने उनकी करुण पुकार सुन उनकी इच्छा को पूरा किया और जब उन्हें सातवीं बार फांसी पर लटकाया गया, तब उनके प्राण निकले थे. शहीद बाबू बंधू सिंह की याद में एक स्मारक भी बनाया गया था.
बकरे की बलि देने की प्रथा
उसी दिन से मंदिर में आज तक बलि देने की प्रथा चलती आई है और चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में भक्त मां के सामने बकरे की बलि देते हैं. चैत्र नवरात्र के मौके पर मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ता है और कष्टों से मुक्ति पाने और मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त नारियल चढ़ाते हैं. कुछ लोग इच्छा पूर्ति के बाद मां को बलि भी भेंट करते हैं.










