खेत में उगाइए ‘नाइट्रोजन का पावरहाउस’, 40 दिन की यह फसल बचाएगी यूरिया का खर्च

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खेत में उगाइए ‘नाइट्रोजन का पावरहाउस’, 40 दिन की यह फसल बचाएगी यूरिया का खर्च

Last Updated:May 09, 2026, 19:59 IST

Kanpur News: ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलें मिट्टी को प्राकृतिक रूप से ताकतवर बनाती हैं और यूरिया पर निर्भरता कम करती हैं. विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार प्रो. वी.के. त्रिपाठी के अनुसार, यदि किसान 35 से 40 दिन की ढैंचा फसल को खेत में पलट दें, तो मिट्टी में बड़ी मात्रा में प्राकृतिक नाइट्रोजन बढ़ती है.

कानपुर: रासायनिक खादों के बढ़ते दाम और लगातार कमजोर होती मिट्टी के बीच किसानों के लिए राहत भरी खबर आई है. कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को ऐसी प्राकृतिक तकनीक अपनाने की सलाह दी है, जिससे खेत खुद ही नाइट्रोजन का बड़ा स्रोत बन सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलें मिट्टी को प्राकृतिक रूप से ताकतवर बनाती हैं और यूरिया पर निर्भरता कम करती हैं. विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार प्रो. वी.के. त्रिपाठी के अनुसार, यदि किसान 35 से 40 दिन की ढैंचा फसल को खेत में पलट दें, तो मिट्टी में बड़ी मात्रा में प्राकृतिक नाइट्रोजन बढ़ती है. इससे खेत की उर्वरता बढ़ती है और अगली फसल को भरपूर पोषण मिलता है. साथ ही मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ने से उसकी पानी रोकने की क्षमता भी बेहतर होती है.

सिर्फ 40 दिन में तैयार हो जाता है ‘ग्रीन गोल्ड’
ढैंचा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बहुत कम समय में तैयार हो जाती है. किसान इसकी बुवाई गर्मी या खरीफ सीजन की शुरुआत में कर सकते हैं. करीब 40 दिन में यह फसल खेत में घनी हरियाली तैयार कर देती है. जब पौधों में फूल आने लगें, उसी समय इसे जुताई करके मिट्टी में मिला दिया जाता है. कुछ ही दिनों में यह पूरी तरह सड़कर प्राकृतिक खाद में बदल जाती है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि ढैंचा मिट्टी में प्राकृतिक नाइट्रोजन जोड़ने के साथ-साथ खेत की बनावट भी सुधारती है. इससे मिट्टी सख्त नहीं होती और फसल की जड़ें तेजी से फैलती हैं. धान, गन्ना, मक्का और सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के लिए यह तकनीक बेहद फायदेमंद मानी जा रही है.

मूंग और दलहनी फसलें भी बढ़ाएंगी मिट्टी की ताकत
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को मूंग जैसी दलहनी फसलों को भी फसल चक्र में शामिल करने की सलाह दी है. दलहनी फसलें हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करती हैं, जिससे अगली फसल को प्राकृतिक पोषण मिलता है. यही कारण है कि अब सरकार भी हरी खाद और दलहनी फसलों को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किसान हर साल एक बार भी ढैंचा या दूसरी हरी खाद वाली फसल खेत में पलट दें, तो धीरे-धीरे रासायनिक खाद की जरूरत कम होने लगती है. इससे खेती की लागत घटती है और मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है.

कम खर्च में ज्यादा पैदावार का नया फॉर्मूला
आज के समय में खेती का सबसे बड़ा संकट बढ़ती लागत है. यूरिया, डीएपी और दूसरी खादों पर किसानों का हजारों रुपये खर्च हो जाता है. ऐसे में ढैंचा जैसी हरी खाद किसानों के लिए कम खर्च में ज्यादा फायदा देने वाला विकल्प बनकर सामने आई है. कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान प्राकृतिक तरीकों को अपनाएं, तो मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी और पैदावार भी बढ़ेगी. यही वजह है कि अब इसे “खेत की नेचुरल यूरिया फैक्ट्री” कहा जा रहा है.

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आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.

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