कानपुर: उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर, जिसकी आबादी लगभग 50 लाख है, अपने नागरिकों को सड़क, पानी, सीवर और साफ-सफाई जैसी मूलभूत सुविधाएं देने के लिए जाना जाता है. लेकिन इन दिनों नगर निगम की खबरें केवल विकास से जुड़ी नहीं बल्कि अंदरूनी विवादों और राजनीतिक खींचतान के कारण सुर्खियों में हैं. शहर की गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह नगर निगम की खींचतान और पार्षदों और मेयर के बीच तनातनी की चर्चा हो रही है.
लोगों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या नगर निगम अब विकास का मंच नहीं, बल्कि सियासी टकराव का अखाड़ा बन गया है? हालात यह हैं कि आम जनता की अपेक्षाओं और नगर निगम के भीतर की राजनीति के बीच गहरा अंतर नजर आने लगा है.
सदन में विवाद और निलंबन
कुछ दिन पहले नगर निगम की सदन बैठक के दौरान भाजपा पार्षद पवन गुप्ता और अंकित मौर्य ने अपनी बात रखने पर जोर दिया. बातचीत बढ़ी, हंगामा हुआ और बैठक की गरिमा पर सवाल खड़े हो गए. इसी के बाद मेयर प्रमिला पांडेय ने दोनों पार्षदों को आगामी चार सदन बैठकों के लिए निलंबित कर दिया.
इस निलंबन के फैसले ने नगर निगम में लंबे समय से दबे असंतोष को खुलकर सामने ला दिया. देखते ही देखते छह अन्य पार्षद मेयर के फैसले के खिलाफ एकजुट हो गए, जिससे निगम का माहौल और तनावपूर्ण बन गया.
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पार्षदों के आरोप, भ्रष्टाचार और भेदभाव
विरोध कर रहे पार्षदों का आरोप है कि नगर निगम में विकास कार्यों का वितरण समान रूप से नहीं हो रहा. कुछ पार्षदों को लगातार बड़े और अधिक काम मिल रहे हैं, जबकि कुछ को महीनों तक इंतजार करना पड़ता है. उनके अनुसार यह केवल नजरअंदाजी नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर खामी है.
साथ ही, पार्षदों ने निगम में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए हैं. ये आरोप नगर निगम के कामकाज और फैसलों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हैं. उनका कहना है कि यदि समय रहते इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका सीधा असर शहर के विकास और नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं पर पड़ेगा.
हर जगह शुरू हुई चर्चा
इस पूरे विवाद की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मेयर और विरोध कर रहे पार्षद दोनों ही भाजपा से जुड़े हैं. इस मामले ने केवल निगम के कामकाज को प्रभावित नहीं किया बल्कि पार्टी संगठन की साख और स्थिरता पर भी असर डाला है. भाजपा जिलाध्यक्ष ने दोनों पक्षों के बीच बातचीत कर हल निकालने की कोशिश की, लेकिन फिलहाल कोई ठोस समाधान नहीं निकला है.
नगर निगम के गलियारों में चर्चा है कि यदि यह विवाद लंबा चला, तो पार्टी के भीतर भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है.
जनता का सवाल, विकास कब होगा?
सदन वाले दिन मेयर ने कहा था कि बैठक में हंगामा ठीक नहीं था और सभी प्रस्तावों पर सहमति भी बन गई थी. लेकिन निलंबन, आरोप और जवाबी आरोपों के बाद नगर निगम का माहौल पूरी तरह बदल चुका है.
शहर के लोग अब सीधे तौर पर यह कह रहे हैं कि उन्हें पार्षदों या मेयर की राजनीतिक लड़ाई में दिलचस्पी नहीं है. उनका मुख्य सवाल यह है कि सड़कें ठीक हों, सीवर जाम न हों और पानी की सप्लाई नियमित मिले.
अभी सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर निगम इस सियासी अखाड़े से बाहर निकलकर फिर से जनता की बुनियादी जरूरतों पर ध्यान दे पाएगा, या यह विवाद और लंबा खिंचेगा.











