Last Updated:January 02, 2026, 14:57 IST
Kakori Rail Action : काकोरी रेल एक्शन के बाद ब्रिटिश दमन ने भले ही क्रांतिकारी आंदोलन को झकझोर दिया, लेकिन इसी दौर में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं के नेतृत्व में नई सोच का उदय हुआ. HRA से HSRA तक का यह सफर केवल सशस्त्र संघर्ष नहीं, बल्कि समाजवादी विचारधारा और शोषणमुक्त भारत के संकल्प की कहानी है.
शाहजहांपुर : लखनऊ के पास काकोरी रेल एक्शन में ब्रिटिश खजाना लूटने के आरोप में जब राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी दी गई, तो लगा कि क्रांतिकारी आंदोलन थम जाएगा. लेकिन इन बलिदानों ने सोए हुए भारत को जगा दिया. हालांकि, इस दमन चक्र ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के बुनियादी ढांचे को झकझोर कर रख दिया और उसके अधिकांश अनुभवी नेता सलाखों के पीछे पहुंच गए. सरकारी खजाने पर कब्जे की इस साहसिक कोशिश ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया, जिसका बदला उन्होंने क्रांतिकारियों को फांसी और कालापानी की सजा देकर लिया.
इतिहासकार डॉ. विकास खुराना ने बताया कि काकोरी रेल एक्शन के बाद का समय HRA के लिए सबसे कठिन ‘अंधकार युग’ था. संगठन का केंद्रीय नेतृत्व लगभग समाप्त हो चुका था और धन व हथियारों की भारी कमी हो गई थी. लेकिन यह अंत नहीं, बल्कि एक रूपांतरण था. बाद में सरदार भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने संगठन की बागडोर संभाली. उन्होंने महसूस किया कि केवल सशस्त्र क्रांति काफी नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट सामाजिक – राजनैतिक विचारधारा की आवश्यकता है. इसी के परिणामस्वरूप 1928 में HRA का विलय नए विचारों में हुआ, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में समाजवाद के बीज बोए.
काकोरी रेल एक्शन ने बदला क्रांतिकारी आंदोलन का स्वरूप
काकोरी रेल एक्शन के बाद बिखरे हुए क्रांतिकारियों को भगत सिंह और सुखदेव जैसे युवा विचारकों ने एक नई दृष्टि दी. सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक गुप्त बैठक हुई, जहां HRA का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) कर दिया गया. इस बदलाव ने आंदोलन के लक्ष्य को ‘केवल सत्ता परिवर्तन’ से बदलकर ‘शोषण मुक्त समाज’ की स्थापना कर दिया. अब क्रांतिकारियों का उद्देश्य केवल बम और पिस्तौल तक सीमित नहीं था, बल्कि वे जनता को जागरूक करने और साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ एक वैचारिक युद्ध लड़ने की दिशा में बढ़ चले थे.
HSRA ने दी ब्रिटिश अहंकार को चुनौती
लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने 17 दिसंबर, 1928 को लाहौर में पुलिस अफसर सांडर्स को गोली मारकर ब्रिटिश अहंकार को चुनौती दी. यह HSRA की पहली बड़ी कार्रवाई थी. उसके बाद 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ के विरोध में सेंट्रल असेंबली की खाली बेंचों पर बम फेंके. उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि बहरों को सुनाना था. उन्होंने भागने के बजाय अपनी गिरफ्तारी दी.
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मीडिया क्षेत्र में पांच वर्ष से अधिक समय से सक्रिय हूं और वर्तमान में News-18 हिंदी से जुड़ा हूं. मैने पत्रकारिता की शुरुआत 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से की. इसके बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड चुनाव में ग्राउंड…और पढ़ें
Location :
Shahjahanpur,Uttar Pradesh
First Published :
January 02, 2026, 14:57 IST
इतिहास के पन्नों में काकोरी : उभरे भगत सिंह और आजाद, HRA से HSRA तक का सफर











