गोंडा: खेती अब सिर्फ पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं रह गई है. बदलते समय के साथ किसान भी नए प्रयोग कर रहे हैं, जिससे कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके. उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां एक युवा किसान ने खेती के तरीके में बदलाव कर अपनी आमदनी बढ़ाने का रास्ता खोज लिया है.
गोंडा जिले के विकासखंड छपिया के अंतर्गत मनीपुर ग्रांट गांव के एक किसान ने अमरूद की बागवानी के साथ मक्के की सहफसली खेती शुरू कर दी है. इस प्रयोग से किसान एक ही खेत से दो फसलें लेकर अच्छी कमाई कर रहे हैं और खेती की लागत भी निकाल पा रहे हैं.
अमरूद के बाग में मक्के की खेती का प्रयोग
प्रगतिशील किसान राजन मौर्य ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उन्होंने अपने ताइवान पिंक अमरूद के बाग में मक्के की खेती शुरू की है. अमरूद के पौधों के बीच काफी खाली जगह रहती है, जहां धूप और हवा दोनों आसानी से पहुंचती है.
इसी खाली जगह का सही उपयोग करने के लिए उन्होंने मक्का बोने का फैसला लिया. मक्का कम समय में तैयार होने वाली फसल है और इसकी देखभाल भी ज्यादा मुश्किल नहीं होती. इससे खेत की जमीन खाली नहीं रहती और किसान को अतिरिक्त आमदनी मिल जाती है.
सहफसली खेती के फायदे
राजन मौर्य बताते हैं कि इस तरीके को सहफसली खेती कहा जाता है. अमरूद एक लंबी अवधि की फसल है. अमरूद लगाने के बाद करीब डेढ़ से दो साल बाद फल आना शुरू होता है.
उन्होंने बताया कि अमरूद के पौधों के बीच जो जगह खाली रहती है, उसमें ऐसी फसल लगाई जा सकती है, जिससे बीच के समय में भी आमदनी होती रहे. इसी सोच के साथ उन्होंने अमरूद के बीच मक्के की खेती शुरू की. मक्का कटने के बाद वह उसी खेत में बोड़ा यानी लोबिया लगाने की योजना बना रहे हैं.
राजन मौर्य ने बताया कि उन्होंने करीब चार बीघा जमीन में अमरूद की बागवानी की है. शुरुआत में अमरूद की खेती में लगभग 70 से 80 हजार रुपये की लागत आई थी.
हालांकि एक बार पौधे लग जाने के बाद आगे चलकर लागत बहुत कम हो जाती है. अमरूद का पौधा लंबी अवधि तक फल देता है और इसका लाइफ टाइम भी काफी ज्यादा होता है. इसी वजह से यह खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा बन सकती है.
सहफसली खेती से बढ़ाएं मुनाफा
राजन मौर्य का कहना है कि जिन किसान भाइयों के पास पर्याप्त जमीन है, उन्हें अमरूद की बागवानी जरूर करनी चाहिए. अगर उसके साथ सहफसली खेती की जाए, तो आमदनी और भी बढ़ सकती है.
उन्होंने बताया कि इस तरह की खेती से न सिर्फ लागत निकलती है, बल्कि खेती को मुनाफे का जरिया भी बनाया जा सकता है.
कहां से मिला आइडिया
राजन मौर्य बताते हैं कि सहफसली खेती का यह आइडिया उन्हें पानी संस्थान के माध्यम से मिला. वहां से मिली जानकारी के बाद उन्होंने इसे अपने खेत में लागू किया और अब इसके अच्छे नतीजे सामने आ रहे हैं.











