2.30 घंटे चला इलाज, 64 वर्षीय नेत्रहीन महिला की बची जिंदगी, डॉक्टरों ने दी मानवता की मिसाल

कानपुर: जिले के GSVM मेडिकल कॉलेज के यूईएसएमएच यानी जच्चा-बच्चा अस्पताल में हाल ही में इंसानियत और इलाज का ऐसा उदाहरण देखने को मिला, जिसने हर किसी का दिल छू लिया. महुआ गांव की 64 साल की नेत्रहीन और बेसहारा महिला सुंदर, जो गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं, आज पूरी तरह ठीक होकर एक नई जिंदगी जी रही हैं. यह सिर्फ एक ऑपरेशन की कहानी नहीं है, बल्कि यह कहानी है संवेदना, सहयोग और उम्मीद की.

वृद्ध महिला सुंदर को बच्चेदानी में बड़ा ट्यूमर था. इसकी वजह से उन्हें लगातार बहुत अधिक खून बह रहा था और शरीर में खून की भारी कमी हो गई थी. हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया था. ऊपर से वह नेत्रहीन थी और उनका कोई सहारा भी नहीं था. अस्पताल तक पहुंचना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई थी. ऐसे वक्त में महुआ गांव के लोगों और ग्राम प्रधान ने इंसानियत दिखाई और उन्हें किसी तरह कानपुर के जच्चा-बच्चा अस्पताल लेकर पहुंचे.

डॉक्टरों ने अपनापन दिखाया

अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों की टीम ने बिना देर किए इलाज शुरू कर दिया. स्त्री और प्रसूति रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. रेनू गुप्ता के नेतृत्व में डॉ. भाविका लाल, डॉ. करिश्मा शर्मा और पूरी मेडिकल टीम ने महिला की हालत को गंभीरता से समझा. जांच के बाद साफ हो गया कि ऑपरेशन ही एकमात्र रास्ता है. डॉक्टरों ने सिर्फ इलाज ही नहीं किया, बल्कि एक परिवार की तरह महिला का ख्याल रखा. खास बात यह रही कि डॉ. करिश्मा शर्मा ने इलाज के दौरान हर कदम पर महिला का साथ दिया और उन्हें कभी अकेलापन महसूस नहीं होने दिया.

दो घंटे की सर्जरी, फिर लौटी मुस्कान

करीब दो घंटे तक चली जटिल सर्जरी के बाद बच्चेदानी का ट्यूमर पूरी तरह निकाल दिया गया. ऑपरेशन सफल रहा और धीरे-धीरे महिला की हालत में सुधार होने लगा. डॉक्टरों की निगरानी में कुछ दिनों तक इलाज चला और जब उनकी स्थिति पूरी तरह ठीक पाई गई, तो उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. इस पूरे इलाज के दौरान गांव के लोग भी लगातार महिला के साथ खड़े रहे, जिससे यह इलाज एक सामूहिक मानवीय प्रयास बन गया.

“मुझे फिर से जीने की वजह मिली”

जब महिला फॉलो-अप के लिए दोबारा अस्पताल आई, तो वह भावुक हो गई. उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे. उन्होंने कहा, “डॉक्टरों ने मुझे नई ज़िंदगी दे दी. आज मुझे फिर से जीने की वजह मिल गई है. यह सुनकर डॉक्टरों की टीम भी भावुक हो गई. जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के जच्चा-बच्चा अस्पताल में हुआ यह इलाज न सिर्फ एक मेडिकल सफलता है, बल्कि यह साबित करता है कि संवेदनशील डॉक्टर सच में लोगों को नई ज़िंदगी दे सकते हैं.

Source

dainikupeditor@gmail.com

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