सहारनपुर : सहारनपुर की धरती हमेशा से अध्यात्म और चमत्कारों की गवाह रही है. इसी भूमि पर एक ऐसे सूफी संत हुए बाबा लाल दास, जिनके चमत्कारों ने न केवल आम जनमानस को बल्कि मुगल बादशाह शाहजहां को भी प्रभावित कर दिया. बाबा लाल दास का जीवन रहस्य और अध्यात्म से भरा हुआ था. माना जाता है कि उनके कमंडल से जल कभी समाप्त नहीं होता था, और मां गंगा की उन पर विशेष कृपा थी.
यह प्रसंग 16वीं सदी का बताया जाता है. उस समय शाहजहां का शासनकाल चल रहा था. बाबा लाल दास अपने शिष्यों के साथ भ्रमण करते हुए सहारनपुर पहुंचे थे. यहां की हरियाली, शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता देखकर उन्होंने एक घाट पर अपनी कुटिया बना ली और तपस्या में लीन हो गए. धीरे-धीरे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी. लोग उनकी साधना और चमत्कारों को देखने के लिए आने लगे.
शाहजहां से लोगों ने की संत की शिकायत
जैसा कि हर महान व्यक्ति के साथ होता है, कुछ लोग उनकी प्रसिद्धि से ईर्ष्या करने लगे. कुछ दरबारी लोगों ने दिल्ली दरबार में शाहजहां से शिकायत की कि सहारनपुर में एक बाबा लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं. यह सुनकर शाहजहां ने सत्यता की जांच के लिए अपने विश्वस्त फकीर को सहारनपुर भेजा. वह फकीर बाबा लाल दास से मिलने पहुंचे और बोले कि बाबा, मुझे बहुत प्यास लगी है, थोड़ा पानी पिलाइए. बाबा ने मुस्कराते हुए अपना कमंडल उठाया और उन्हें पानी पिलाना शुरू किया. वह पीते रहे, और बाबा पिलाते रहे परंतु कमंडल का पानी समाप्त नहीं हुआ. यह देखकर वह फकीर दंग रह गया और बाबा के चरणों में बैठ गया. उसने वहीं अपनी कुटिया बना ली और वापस नहीं लौटा.
नहीं खत्म हुआ कमंडल का जल
जब वह फकीर दरबार नहीं लौटा तो दरबारियों ने फिर शाहजहां से कहा कि बाबा ने आपके फकीर का भी धर्म परिवर्तन करा दिया. तब शाहजहां ने अपने एक और सिद्ध फकीर, हाजी शाह कमाल, को भेजा. हाजी शाह कमाल भी बाबा के पास पहुंचे और उन्होंने भी वही कहा कि बाबा, प्यास लगी है, पानी पिलाइए। बाबा ने पुनः कमंडल से जल दिया. हाजी शाह कमाल ने भी वही अनुभव किया पानी पीते रहे पर कमंडल का जल खत्म नहीं हुआ. तभी दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया और एक गहरी आध्यात्मिक मित्रता स्थापित हुई. हाजी शाह कमाल भी वहीं ठहर गए और बाबा लाल दास के अनुयायी बन गए. दोनों ने एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते हुए अपनी साधना जारी रखी. आज भी सहारनपुर में बाबा लाल दास के आश्रम के पास हाजी शाह कमाल की दरगाह मौजूद है, जो इस अनूठी मित्रता की प्रतीक है.
शाहजहां भी रह गया दंग
जब शाहजहां को यह ज्ञात हुआ कि उसके दोनों फकीर लौटकर नहीं आए, तो वह स्वयं सहारनपुर पहुंचा. उसने बाबा से कहा कि मेरी सेना प्यास से व्याकुल है, कृपा कर इन्हें जल पिलाइए. बाबा ने अपने कमंडल से पूरे लश्कर को पानी पिलाया, और सभी आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि कमंडल का जल फिर भी समाप्त नहीं हुआ. यह चमत्कार देखकर शाहजहां बाबा के चरणों में झुक गया और प्रभावित होकर एक शाही फरमान जारी किया. उसने बाबा लाल दास को सैकड़ों बीघा भूमि दान में दी, जो आज भी सहारनपुर में विद्यमान है. बाबा लाल दास और हाजी शाह कमाल की यह कथा केवल एक चमत्कार की नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव और आध्यात्मिक एकता की मिसाल है, जो आज भी सहारनपुर की मिट्टी में गूंजती है.











