गाजीपुर: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2025 अपने अंतिम दिन पर पहुंच चुका है और पूरे शहर में इसका उल्लास चरम पर है. ‘जड़ों की ओर’ थीम पर आधारित यह आयोजन न केवल पूर्वांचल बल्कि पूरे उत्तर भारत का एक बड़ा साहित्यिक केंद्र बनकर उभरा है. इस फेस्टिवल ने गाजीपुर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मानचित्र पर नई पहचान दी है.
साहित्य के उत्सव में उमड़ा जनसैलाब
तीन दिनों तक चले इस आयोजन ने गाजीपुर को साहित्य, संस्कृति और संवाद का केंद्र बना दिया. लंका मैदान में लगी पुस्तक प्रदर्शनी में स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के लेखकों की रचनाओं ने दर्शकों को आकर्षित किया. गाजीपुर के लेखकों की पुस्तकों को लेकर पाठकों में विशेष उत्साह देखा गया. लखनऊ से आए एक विद्यार्थी ने कहा, “हम ऐसे कार्यक्रम सिर्फ दिल्ली या लखनऊ में देखते थे. लेकिन जब सुना कि अपने गाजीपुर में लिटरेचर फेस्टिवल हो रहा है, तो लौटना ही भूल गए.”
शायरी और भोजपुरी कविताओं की महफिल ने बांधा समा
फेस्टिवल के अंतिम दिन नंद रेजिडेंसी में आयोजित ‘कविता और शायरी की शाम’ में मशहूर शायर अजहर इकबाल और भोजपुरी साहित्य के लोकप्रिय कवि मनोज भावुक ने अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. मनोज भावुक ने अपनी चर्चित रचनाओं “खिलने दो खुशबू पहचानो”, “कलियों को मुसकाने दो”, “चौखट से सरहद तक नारी”, “फिर भी अबला हाय बेचारी?” जैसी कविताओं से समाज में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण पर गहरा संदेश दिया. उन्होंने भोजपुरी भाषा के वैश्विक प्रचार-प्रसार की दिशा में अपने योगदान से दर्शकों का मन जीत लिया.
गरिमामय उद्घाटन सत्र में शामिल हुए देश-विदेश के अतिथि
फेस्टिवल के उद्घाटन सत्र में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, भारत एक्सप्रेस के सीएमडी उपेंद्र राय, राज्यसभा सांसद संगीता बलवंत और दक्षिण अफ्रीका के राजदूत प्रो. अनिल सुकलाल जैसे प्रतिष्ठित अतिथि मौजूद रहे. उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा, “गाजीपुर मेरी आत्मा का हिस्सा है.” उन्होंने इस शहर की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर बल दिया और साहित्य को समाज के परिवर्तन का माध्यम बताया.
पूर्वांचल की मिट्टी में साहित्य की नई पहचान
तीन दिनों तक चले इस आयोजन में गिरमिटिया समाज पर विशेष सत्र, कविता-पाठ, लोककला प्रदर्शन और साहित्यिक संवादों ने पूर्वांचल की संस्कृति को एक नई दिशा दी. यह महोत्सव केवल साहित्य का उत्सव नहीं, बल्कि गाजीपुर की सांस्कृतिक जागृति का प्रतीक बन गया. लोगों ने पहली बार अपने ही शहर में साहित्य, कविता, कला और संवाद को इतने करीब से महसूस किया. गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने यह साबित कर दिया कि साहित्य की आत्मा केवल दिल्ली या मुंबई की गलियों में नहीं, बल्कि गाजीपुर की मिट्टी में भी उतनी ही जीवंत है.











