कानपुर: देशभर में एक समय था जब गांवों में शौचालय होना सपना माना जाता था. सरकारों ने योजनाएं चलाईं, जागरूकता फैलाई और आज हालात यह हैं कि गांव-गांव, घर-घर शौचालय नजर आ जाते हैं. लेकिन कानपुर जैसे बड़े महानगर के बीचों-बीच एक ऐसा इलाका है, जहां यह सपना आज भी हकीकत नहीं बन पाया. कानपुर के पॉश इलाके माने जाने वाले हर्ष नगर में स्थित संतलाल का हाता आज भी बुनियादी सुविधा से वंचित है. यहां करीब 250 परिवार रहते हैं और आबादी लगभग 3000 के आसपास है. हैरानी की बात यह है कि इस पूरे इलाके में एक भी घर में निजी शौचालय नहीं है. सभी लोग मजबूरी में सामुदायिक शौचालय पर निर्भर हैं.
10 सीट, 3000 लोग और रोज़ की लंबी लाइन
संतलाल का हाता में जो सामुदायिक शौचालय बना है, उसमें पुरुष और महिलाओं के लिए मिलाकर करीब 10 सीटें हैं. सुबह होते ही यहां लंबी लाइन लग जाती है. बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे सबको अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है. कई बार लोगों को काम, स्कूल या दफ्तर के लिए देर हो जाती है, लेकिन विकल्प कोई नहीं. स्थानीय लोगों का कहना है कि सुबह-सुबह की यह लाइन उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा तनाव बन चुकी है. बारिश हो या ठंड, हर हाल में इसी गंदगी और बदहाली से गुजरना पड़ता है.
महिलाओं की आंखों से छलकता दर्द
जब क्षेत्र की महिलाओं से बात की गई, तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. उनका कहना है कि इस वजह से उनके बच्चों की शादियां तक नहीं हो पा रहीं. कोई भी परिवार ऐसी जगह रिश्ता नहीं करना चाहता, जहां घर में शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा न हो. महिलाओं ने बताया कि अंधेरा होने का इंतजार करना, गंदगी में जाना और सुरक्षा का डर ये सब उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. कई बार बीमारियां भी फैलती हैं, लेकिन मजबूरी में सब सहना पड़ता है.
50 साल से रह रहे हैं, लेकिन सुविधा आज तक नहीं
यहां रहने वाले बुजुर्गों का कहना है कि उनका जन्म यहीं हुआ, यहीं उनकी पूरी जिंदगी गुजर गई, लेकिन आज तक सीवर लाइन तक नहीं पड़ी. लोगों ने नगर निगम से लेकर कई अधिकारियों के चक्कर लगाए, आवेदन दिए, शिकायतें कीं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला.स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि जब तक सीवर लाइन नहीं डाली जाएगी, तब तक घरों में शौचालय बन ही नहीं सकते.
आवाज़ उठाई तो सदन से निष्कासन
इलाके के पार्षद पवन गुप्ता ने जब इस गंभीर मुद्दे को नगर निगम के सदन में उठाया, तो उन्हें सदन से निष्कासित कर दिया गया. इससे लोगों में और ज्यादा गुस्सा और मायूसी है. उनका सवाल सीधा है क्या बुनियादी जरूरत की बात करना भी गुनाह है? संतलाल का हाता आज सिस्टम से पूछ रहा है कि जब गांवों तक शौचालय पहुंच सकते हैं, तो शहर के बीचों-बीच बसे इस इलाके की बारी कब आएगी? यह सिर्फ एक मोहल्ले की कहानी नहीं, बल्कि उस हकीकत का आईना है, जहां विकास के दावे जमीन पर दम तोड़ते नजर आते हैं.










