सुल्तानपुर: कहते हैं कि अगर इंसान के दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो संसाधनों की कमी भी उसकी राह नहीं रोक पाती. ऐसी ही प्रेरक कहानी है सुल्तानपुर जिले के रहने वाले युवा राजकुमार प्रजापति की, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद मिट्टी को अपना सहारा बनाया और आज उसी मिट्टी से अपनी पहचान और रोज़गार दोनों गढ़ रहे हैं. राजकुमार आज मिट्टी के तंदूर चूल्हे और अन्य बर्तन बनाकर न सिर्फ आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि अच्छी कमाई भी कर रहे हैं.
शहर में जगह की कमी बनी बदलाव की वजह
राजकुमार प्रजापति मूल रूप से सुल्तानपुर शहर के पल्टन बाजार क्षेत्र में अपने पैतृक मकान में रहते थे. जैसे-जैसे परिवार का आकार बढ़ता गया, वैसे-वैसे घर में रहने की जगह कम पड़ने लगी. बढ़ती आबादी और सीमित स्थान ने उन्हें नया ठिकाना तलाशने के लिए मजबूर कर दिया. इसी कारण उन्होंने शहर से सटे गांव डॉटा में जमीन खरीदकर वहां अपना घर बनवाया और परिवार के साथ बस गए.
आर्थिक तंगी से निकला आत्मनिर्भरता का रास्ता
शुरुआती दिनों में राजकुमार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी. शहर छोड़कर गांव में बसना उनके लिए आसान फैसला नहीं था. सीमित आमदनी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने ठान लिया कि अब खुद का काम शुरू करेंगे. इसके बाद उन्होंने अपने पारिवारिक हुनर को आजीविका का साधन बनाने का फैसला किया और मिट्टी से जुड़े पारंपरिक काम को अपनाया.
मिट्टी से तंदूर और बर्तनों का निर्माण
राजकुमार प्रजापति आसपास के ग्रामीण इलाकों से अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी मंगवाते हैं. मिट्टी को अच्छी तरह गूंथने के बाद वह उससे तंदूर की रोटी बनाने वाले मिट्टी के तंदूर चूल्हे तैयार करते हैं. इसके साथ ही वह कुल्हड़, दिए और अन्य मिट्टी के बर्तन भी बनाते हैं. उनकी बनाई चीजों की बाजार में अच्छी मांग है, जिससे उनका व्यवसाय लगातार बढ़ रहा है.
प्रतिदिन हजारों की हो रही कमाई
राजकुमार प्रतिदिन करीब दो हजार कुल्हड़ बनाते हैं, जिन्हें वह बाजार में बेचते हैं. इस काम से उन्हें रोज़ाना लगभग दो हजार रुपये तक का मुनाफा हो जाता है. तंदूर चूल्हों की बिक्री से अलग आमदनी होती है. इस तरह मिट्टी के उत्पादों ने उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना दिया है और परिवार का खर्च आसानी से चल रहा है.
पारिवारिक विरासत और बच्चों का भविष्य
राजकुमार प्रजापति ने मिट्टी के बर्तन बनाने की कला अपने परिवार से ही सीखी है. भले ही वह ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन उनके हाथों में ऐसा हुनर है कि मिट्टी को खूबसूरत और उपयोगी रूप दे देते हैं. उनके एक बेटा और एक बेटी हैं, जो फिलहाल पढ़ाई कर रहे हैं. राजकुमार चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें और बेहतर भविष्य बनाएं.
प्रेरणा बन रहे हैं राजकुमार प्रजापति
राजकुमार प्रजापति की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को छोड़ देते हैं. उन्होंने यह साबित कर दिया कि मेहनत, लगन और हुनर से कोई भी व्यक्ति आत्मनिर्भर बन सकता है और सम्मानजनक जीवन जी सकता है.










