धौरहरा की पावन भूमि: वट वृक्ष के साए में आज भी जीवित है तुलसीदास की तपस्या, जानें यहां का रहस्‍य

लखीमपुर खीरी: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले का धौरहरा कस्बा धार्मिक और साहित्यिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यहीं स्थित श्री राम वाटिका धाम वह पावन स्थल है, जहां गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकांड की रचना की थी. आज भी यहां मौजूद वट वृक्ष, संत तुलसीदास की तपस्या और रचना साधना का साक्षी माना जाता है. दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन और मनोकामना के लिए पहुंचते हैं.

धौरहरा में स्थित है श्री राम वाटिका धाम
लखीमपुर खीरी जिले के धौरहरा कस्बे में स्थित श्री राम वाटिका धाम को तुलसीदास जी की कर्मभूमि माना जाता है. मान्यता है कि करीब 471 वर्ष पूर्व गोस्वामी तुलसीदास इस स्थान पर आए थे. उस समय उत्तर दिशा में सरयू नदी, जिसे आज घाघरा नदी कहा जाता है, बहती थी. यह शांत और प्राकृतिक वातावरण तुलसीदास जी को इतना प्रिय लगा कि उन्होंने यहीं निवास करने का निर्णय लिया.

वट वृक्ष से जुड़ी है ऐतिहासिक कथा
स्थानीय लोगों के अनुसार, जब धौरहरा रियासत के जांगड़ा राजा जोत सिंह को तुलसीदास जी के आगमन की सूचना मिली, तो वे उनसे मिलने पहुंचे. उस समय तुलसीदास जी सरयू नदी के तट पर स्नान करने गए थे. राजा ने उनका आसन खाली देखकर उस पर बैठ गए. जब तुलसीदास जी लौटे और राजा को अपने आसन पर बैठा देखा, तो वे क्रोधित हो गए. इसी दौरान उन्होंने अपनी दातुन वहां गाड़ दी, जो समय के साथ एक विशाल वट वृक्ष में परिवर्तित हो गई. यह वट वृक्ष आज भी राम वाटिका धाम में मौजूद है.

यहीं हुई बालकांड और सुंदरकांड की रचना
न्यूज़ 18 लोकल से बातचीत में भगवती प्रसाद शुक्ला ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास ने श्री राम वाटिका धाम में ही रामचरितमानस के बालकांड और सुंदरकांड की रचना की थी. यह रचनाएं आज भी भारतीय साहित्य और संस्कृति की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं. इस पवित्र स्थल पर श्रद्धालु अपने बच्चों का मुंडन संस्कार, उपनयन संस्कार और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराने के लिए आते हैं.

धौरहरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
श्री राम वाटिका धाम धौरहरा की पहचान ही नहीं, बल्कि उसकी धरोहर भी मानी जाती है. यह स्थल न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय संस्कृति और साहित्य का एक महत्वपूर्ण प्रतीक भी है. संत तुलसीदास जी के प्रति श्रद्धा और सम्मान का यह स्थान आज भी जीवंत प्रमाण है. प्रत्येक वर्ष यहां यज्ञ और धार्मिक आयोजन भी होते हैं.

बालकांड का महत्व और संरचना
बालकांड रामचरितमानस का पहला और सबसे बड़ा कांड है. इसमें भगवान श्रीराम के जन्म, बाल लीलाओं और माता सीता के साथ विवाह तक की घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है. बालकांड में कुल 77 सर्ग और लगभग 2280 श्लोक हैं. तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में इसकी रचना की, जिसमें चौपाई, दोहा, सोरठा और छंदों का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है.

बालकांड से जुड़े प्रसिद्ध दोहे और चौपाइयां
दोहा-
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥203॥

इसका अर्थ है कि भगवान श्रीराम भोजन करते समय भी चंचल रहते हैं और अवसर पाकर दही-भात लेकर किलकारी मारते हुए इधर-उधर दौड़ पड़ते हैं.

चौपाई-
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥
जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥1॥

अर्थ है कि श्रीराम की बाल लीलाएं अत्यंत सुंदर और सरल हैं, जिनका गुणगान स्वयं देवताओं और वेदों ने किया है. जिनका मन इन लीलाओं में नहीं रमता, वे दुर्भाग्यशाली माने जाते हैं.

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dainikupeditor@gmail.com

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