खड़ाऊ पहनने से क्या फायदे, साधु-संत क्यों धारण करते हैं? सारे सवालों का यहां मिलेगा जवाब

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खड़ाऊ पहनने से क्या फायदे, साधु-संत क्यों धारण करते हैं? यहां मिलेगा जवाब

Last Updated:January 01, 2026, 16:31 IST

Saharanpur News: हम आपको खड़ाऊ के फायदे बताने जा रहे हैं. खड़ाऊ (लकड़ी की चप्पल) पहनने से रक्त संचार सुधरता है, मानसिक और शारीरिक थकान दूर होती है, पाचन क्रिया बेहतर होती है, रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है और शरीर का संतुलन बनता है.

सहारनपुर: व्यक्ति दिनभर जूते चप्पल तो पहनता है, लेकिन क्या आपको पता है कि घर में मात्र थोड़े समय के लिए खड़ाऊ पहनना कितना फायदेमंद होता है. आज हम आपको खड़ाऊ के फायदे बताने जा रहे हैं. खड़ाऊ (लकड़ी की चप्पल) पहनने से रक्त संचार सुधरता है, मानसिक और शारीरिक थकान दूर होती है, पाचन क्रिया बेहतर होती है, रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है और शरीर का संतुलन बनता है.

यह सकारात्मक ऊर्जा को संरक्षित कर आध्यात्मिक विकास में भी मदद करती है और नकारात्मक ऊर्जा से बचाती है, क्योंकि यह जमीन के सीधे संपर्क को कम करती है. खड़ाऊ भी कई प्रकार की आती है तो आइए जानते हैं कि किस प्रकार की खड़ाऊ को आप घर में पहन सकते हैं और किस प्रकार की खड़ाऊ को साधु-संत इस्तेमाल करते हैं.

साइज के हिसाब से खड़ाऊ धारण

1 इंच की पावड़ी पुरुष धारण कर सकता है, 2 इंच सन्यासी धारण कर सकते हैं, 3 इंच की पावड़ी को ब्रह्मचारी धारण कर सकते हैं. हमारे बड़े-बड़े मठाधीश, बड़े-बड़े आदि गुरु, शंकराचार्य, सभी अंगूठे वाली खड़ाऊ को धारण करते हैं. जो व्यक्ति अंगूठे वाली खड़ाऊ को धारण करता है, उसे बहुत ही लाभ प्राप्त होता है. उसकी तल रेखा से हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा, तल रेखा, भाग्य रेखा होती है, वह प्रबल हो जाती है. जबकि खड़ाऊ का चलन भगवान श्री राम के कार्यकाल से ज्यादा शुरू हुआ था. अगर आपके भी घर में खड़ाऊ नहीं है तो आप भी अपने घर में खड़ाऊ ले आएं और पूजा के समय इस्तेमाल जरूर करें.

लकड़ी की खड़ाऊ के लाभ

आचार्य सोमप्रकाश शास्त्री ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि खड़ाऊ शरीर की विपदाओं को दूर करती है. जब हम पढ़ते हैं तो ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं. शरीर के ऊपर बिना सिला हुआ वस्त्र पहरते हैं और नीचे लकड़ी की पावड़ी अर्थात खड़ाऊ पहनते हैं. अब यहां पर कहना चाहूंगा कि खड़ाऊ व पावड़ी कई प्रकार की होती है. वह अंगूठे की भी होती है, पट्टी वाली भी होती है, पीछे से रबड़ वाली भी होती है, लेकिन यहां पर खड़ाऊ का वर्णन है और उसके पश्चात यहां पर पावड़ी का विवरण आता है.

पावड़ी एक छोटी मध्यस्थ में होती है, जिसके ऊपर रबर लगी हुई होती है और वह व्यक्ति डालकर आराम से चल सकता है. जो खड़ाऊ आती है वह हमारे गुरुजनों का एक प्रतीक माना गया है. इसकी शुरुआत रामचंद्र जी के काल से और पहले प्रारंभ हुई है, जब भरत जी ने भगवान श्री राम के चरण पादुका अपने सिर पर रखकर के 14 वर्षों तक राज्य किया था और अपने बराबर में खड़ाऊ सिंहासन पर रखा था. उन पावड़ियो को धरने से व्यक्ति में लाभान्वित होती है. पावड़ी की जो हाइट होती है, वह एक इंच होती है, जिसे नॉर्मल पुरुष धारण कर सकता है. 2 इंच खड़ाऊ सन्यासी धारण कर सकते हैं, 3 इंच की जो पावड़ी होती है, वह ब्रह्मचारी धारण कर सकते हैं.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.

Location :

Saharanpur,Uttar Pradesh

First Published :

January 01, 2026, 16:31 IST

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

Source

dainikupeditor@gmail.com

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